प्रवाह

निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....

धनिया कहे पियाजी से ~~

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ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लोकोक्तियाँ और कहावते प्रचलित होती हैं. ये गूढ़ अर्थ युक्त होते हैं. बचपन में सुनी एक इसी तरह की कुछ पंक्तियाँ :



"धनिया कहे पियाजी से


सुन लेहसुन मोर बात


सोआ रहा जब पालकी में


जीव गाजर हो जात"


अर्थात धनिया अपने पिया जी से कहती है कि आप मेरी बात सुन लीजिये. जब मैं शादी के बाद घर आते समय आपके साथ पालकी में सोई थी तो मैं अत्यंत लाजमयी हो गई थी.


धनिया : मसाला / धनिया नाम की स्त्री


पियाजी : पिया जी/ प्याज


लेहसुन : लेहसुन / सुन लो


सोआ : सोई / पालक के साथ उगने वाला साग


जीव गाजर हो जात : जी बहुत लजाता था / गाजर

अगला धमाका होने तक ..

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आज फिर


बम धमाका हुआ है,


प्रशासन फिर


नींद से जाग गया है.


लाल बत्ती युक्त गाड़ियाँ


फिर दौड़ने लगी हैं सड़कों पर


बैरकें लगा दी गयी हैं,


सड़क पर आवाजाही


प्रतिबन्धित कर दी गई हैं.


फिर


दिनचर्या को बार-बार


उलाहने दिये जायेंगे;


खुफिया कैमरे की


नई प्लान बनेगी;


हर आम आदमी को


रखा जायेगा सन्देह के दायरे में;


पूरा शहर रौशन होगा


कैमरे के फ्लैश से;


प्रायोजित जीजिविषा की तस्वीरें


बाँटी जायेंगी.


सरकार चाक-चौबन्द है


कुछ रातें नज़रों में ही


काटी जायेंगी,


फिर इंतजार किया जायेगा


जीवन सामान्य होने तक


तब तक नींद फिर हाबी होगी


प्रशासन की आँखों में


वह फिर सो जायेगी


अगला धमाका होने तक.


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

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निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम



अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम


साक्षात मगर हो


दिवा-सपन सी


साहचर्य तुम्हारा


पूस-कपन सी


लजायमान स्पर्श-कामना को स्पर्श-बोध चाहिये


कल-कल-निनाद साधों को ना अवरोध चाहिये


बाधित आतुरता के कोमल भाव सहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


भ्रमर गुंजन सी


श्वासों की लहरी


सम्पूर्ण कायनात


शायद है ठहरी


अनकहे सन्देशों ने जब सब कुछ कह डाला है


फिर क्यूँ इन मृद अधरों पर चुप्पी का ताला है


सागर-मिलन को आतुर लहरों सी बहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


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