शुक्रवार, 17 जून 2011

अब तक संचित वह क्षण ..

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तब जबकि

तुम्हारे काँपते हाथों पर

मैनें

अनायास

रख दिया था हाथ;

और फिर

क्षण भर के लिये

प्रकम्पित हो गया था

सम्पूर्ण कायनात,

परिलक्षित हुआ

चिर संचित

सम्पूर्ण चेतना का

अवचेतित स्वरूप

अवशोषित हो गया था

जब पलांश में

सूर्य रश्मि;

वह प्रखर धूप.

तुम चली गयी थी

अनबोले जब

सबकुछ कहकर

वह पावन छवि

नज़र चुराते चितवन की

मधु प्रमत्त मधुकर सा

मंजर वह मदहोश

अब तक संचित वह क्षण

कहाँ मुझे है होश !!

बृहस्पतिवार, 16 जून 2011

लाईन सीधी हो गई ...

वह लाईन के कुछ हिस्से को मिटाता और फिर उसे सीधी करने का प्रयास करता. बारम्बार कोशिशों के बावजूद वह सफल नहीं हो पाया. हाँ ! इस प्रयास में लाईन और टेढ़ी होती जा रही थी. अंत में वह खीज गया और पूरी की पूरी लाईन मिटा दिया तथा उसके स्थान पर एक दूसरी लाईन खींच दी. अरे यह क्या ! लाईन तो बिलकुल सीधी हो गई.

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बृहस्पतिवार, 9 जून 2011

हमके तू बतावा ... (भोजपुरी)

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देसवा क हमरे समाचार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
कउने खेतवा में चना बोआयल
कइसे बगइचा से लकड़ी ढोआयल
केतना भयल बनिया क उधार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा
.
अबकी कटहर क केकर हौ पारी
बऊर आ गयल होई अमवा के डारी
मचल होई भौरन क गुंजार हो हमके तू बातावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
गेहूं के पानी मीलल की नाहीं
गिरल बरधा अबले हीलल की नाहीं
फूलल होई सरसों अपार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
गउवां के हमरे पुरवैया छुवत होई
टप-टप भोरहरी में महुवा चुवत होई
बीनत होई माई हमार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
घर के खपड़ा पे कदुआ चढ़ल होई
अबकी त बछवा के नाथी नढ़ल होई
भुलाई गइल अमवा क अचार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा
.
बाबु अम्मा हमके जोहत त होइह
अपने बतिया से सबके मोहत त होइह
ओनसे कहा आइब अबकी बार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा

बुधवार, 1 जून 2011

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद ....

जेठ की दुपहरी में

आंचल लहराकर तुमने

एक छत लिखा है;

मिल गया आज

मेरे नाम जो तुमने

ख़त लिखा है,

एहसासों के मुँह पर

उंगली रख मना कर दिया

कुछ बोलने से;

डायरी में सहेज कर

ख़ुद को मना कर दिया

खत खोलने से.

मुझे पता है

उस लिफाफे में महज़

कोरा कागज़ ही होगा,

अल्फाज़ तो पहले ही

चले आये हैं;

बादल यूँ ही तो नहीं

छाये हैं,

इस खत की हर इबारत

पढ़ लिया था

मैनें तो उसी दिन

जब फ़िजा में मिश्री की डली

अनजाने में तुम घोल रही थी

गुमसुम–खामोश तुम

नज़रों से बोल रही थी

नहीं पढ़ पाऊँगा

कोई दूसरा ख़त

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद

बेशक वह

तुम्हारा लिखा ही क्यों न हो !!

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