शुक्रवार, 12 जून 2009

अस्मत लुटना आम बात है ---


.
सर के ऊपर
घर नहीं है
आतताईयों को
अब कोई डर नहीं है
चलती ट्रेन में
अस्मत का लुटना
आम बात है खबर नहीं है
चीखने-चिल्लाने का
कोई भी असर नहीं है
रंजो-गम से परे हो जाओ
सुनो मत बहरे हो जाओ
आँख को देखने मत दो
पैर को चलने मत दो
अँधेरा बेशक हो
दीया कोई जलने मत दो
ज़मीर बेचना होगा
गर ज़मीन पर खड़ा होना है
वरना उस की तरह
धूल में पड़ा होना है
परिंदे तो हैं
पर 'पर' नहीं है
सर के ऊपर
घर नहीं है

9 टिप्‍पणियां:

  1. Reality of today's world is shown by you by this poem. It's really nice.

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब। खासकर समापन तो कमाल का है। बधाई।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.

    जवाब देंहटाएं
  3. रंजो-गम से परे हो जाओ
    सुनो मत बहरे हो जाओ
    आँख को देखने मत दो
    पैर को चलने मत दो
    bhut shi likha hai
    bhavna shuny hokar ak putla sa bnta ja rhe hai ham aur hmari is kmjori ka fayda uthakar vikrat mansikta ko smaj par lade ja rhe hai log .

    जवाब देंहटाएं
  4. आज की दुनिया में अगर सभ्य बनकर जीना है तो अपने एहसासों का गला घोंटना पड़ेगा......समाज के कुछ तथाकथित ठेकेदारों का तो ऐसा ही मानना है.....अच्छी चोट की है आपने इन मौकापरस्तों पर.......

    साभार
    हमसफ़र यादों का.......

    जवाब देंहटाएं
  5. "ज़मीर बेचना होगा
    गर ज़मीन पर खड़े होना है
    वरना उसी की तरह
    धुल में पडा होना होगा."

    कितनी सहजता से कह गए सर आप् इतनी गहरी सी बात... बहतु सुंदर...

    जवाब देंहटाएं
  6. आपकी कविता एक से बढकर एक है! लाजवाब!

    जवाब देंहटाएं