प्रवाह

निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....

मंगलवार, 23 जून 2026

चुना हुआ मौन

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आदमी देख नहीं सकता, यदि आँखें न हों। सुन नहीं सकता, यदि कान न हों। बोल नहीं सकता, यदि मुँह न हो। लेकिन— आँखें होते हुए भी जो देखता ...
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रविवार, 7 अप्रैल 2019

मतदान करो

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चंगों को; नंगों को; बनावटी भिखमंगों को, कभी भी मत दान करो सुशासन के लिए; स्वच्छ प्रशासन के लिए बिना चूके मतदान करो
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मंगलवार, 26 जून 2012

पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना …..

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तेरी गली से होकर गुजरने लगा है आईना तेरी हर आहट पर संवरने लगा है आईना . लटें संवार कर तुम चली गयी पल भर में जाने क्या सोच...
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शुक्रवार, 11 मई 2012

जब से पत्थर इतने रंगीले हो गए …

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आईनों के चेहरे पीले हो गए जब से पत्थर इतने रंगीले हो गए . आईना टूटकर बिखर जाता है जब भी खुद को आईने के सामने पाता है . आईना उनक...
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रविवार, 29 अप्रैल 2012

कथोपकथन हो गया …..

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नजर मिली नजर झुकी कथोपकथन हो गया मन बावरा न जाने किन ख्वाबों में खो गया . ‘पत्थर’ ने पत्थर मारा चोट लगी ‘पत्थर’ को पत्थरमय फिर...
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सोमवार, 16 अप्रैल 2012

अब तक तो वो आई ना

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चलो मान लिया कि तुम नहीं दृष्टिहीन हो, पर फायदा क्या जब तुम्हारे अंदर दृष्टि ही न हो ************* बिछा रखा था जिसके लिये हर राह...
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शनिवार, 7 अप्रैल 2012

तीन स्थितियां तीन शब्द चित्र

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धूप में भूखा-प्यासा जलता रहा सूरज फिर भी पूरे दिन चलता रहा सूरज . तुम्हारी चुप्पी के उस कथन को सुनता रहा मैं. सुन न पाया तद...
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शुक्रवार, 17 जून 2011

अब तक संचित वह क्षण ..

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तब जबकि तुम्हारे काँपते हाथों पर मैनें अनायास रख दिया था हाथ; और फिर क्षण भर के लिये प्रकम्पित हो गया था सम्पूर्ण कायनात, परि...
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गुरुवार, 16 जून 2011

लाईन सीधी हो गई ...

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वह लाईन के कुछ हिस्से को मिटाता और फिर उसे सीधी करने का प्रयास करता. बारम्बार कोशिशों के बावजूद वह सफल नहीं हो पाया. हाँ ! इस प्रयास में ल...
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गुरुवार, 9 जून 2011

हमके तू बतावा ... (भोजपुरी)

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देसवा क हमरे समाचार हो हमके तू बतावा फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा . कउने खेतवा में चना बोआयल कइसे बगइचा से लकड़ी ढोआयल केतना भयल...
6 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 1 जून 2011

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद ....

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जेठ की दुपहरी में आंचल लहराकर तुमने एक छत लिखा है ; मिल गया आज मेरे नाम जो तुमने ख़त लिखा है , एहसासों के मुँह पर उंगली रख...
17 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 27 अप्रैल 2011

पहचान – The identity

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खुद की पहचान के लिये उनसे पहचान बनाते-बनाते मैनें उन्हें पहचान लिया, और फिर - पहचान बनते-बनते रह गई. .. कई बार उन्होनें पुरजोर कोशिश...
20 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 11 अप्रैल 2011

सबसे सुरक्षित स्थान ... (लघुकथा)

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पूरा का पूरा महकमा हलकान परेशान था. अपराधियों का ताण्डव पूरे शहर के वातावरण को दूषित और दुश्वार करता जा रहा था. सरकार ने फरमान जारी कर दिया...
12 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 23 मार्च 2011

उद्घाटन ... (लघुकथा)

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अभी भवन निर्माण का कार्य सम्पन्न भी नहीं हुआ था पर मंत्रालय से सूचना आ गयी कि कल मंत्री जी भवन का उद्घाटन करने वाले हैं. सारा का सारा महकम...
12 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 10 जनवरी 2011

ठूँठ .... (लघुकथा)

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वह अधमरा सा था. उठ भी तो नहीं सकता था. पेड़ की टहनियों को देखा नहीं गया, वे झुककर उसे हवा करने लगीं. उसे श्वास लेने में परेशानी महसूस हो र...
11 टिप्‍पणियां:
सोमवार, 13 दिसंबर 2010

धनिया कहे पियाजी से ~~

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ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लोकोक्तियाँ और कहावते प्रचलित होती हैं. ये गूढ़ अर्थ युक्त होते हैं. बचपन में सुनी एक इसी तरह की कुछ पंक्तियाँ :...
11 टिप्‍पणियां:
बुधवार, 8 दिसंबर 2010

अगला धमाका होने तक ..

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आज फिर बम धमाका हुआ है, प्रशासन फिर नींद से जाग गया है. लाल बत्ती युक्त गाड़ियाँ फिर दौड़ने लगी हैं सड़कों पर बैरकें लगा दी गयी ...
11 टिप्‍पणियां:
शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

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निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम साक्षात मगर हो दिवा-सपन सी साहचर्य तुम्हारा पूस-...
12 टिप्‍पणियां:
रविवार, 28 नवंबर 2010

तुम शब्द सम्पदा परिपुष्ट मगर ढाई आखर --

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तुम दिवास्वप्न , तुम मायावी , तुम यायावर तुम प्रकम्पित अधरों के बीच अस्फुट स्वर ढूढ़ रहा मैं ठाँव तुम्हारा ढूढ़ रहा मैं गाँव तुम्हारा ...
16 टिप्‍पणियां:
शनिवार, 20 नवंबर 2010

एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?

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क्षितिजा जी की बेहद खूबसूरत रचना उफ़ !! के कमेंट में मैनें एक शेर लिखा जिसके प्रतिक्रिया में उनका ईमेल आया : "वर्मा जी ... आपके कम...
10 टिप्‍पणियां:
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वाराणसी में पला-बढ़ा, दिल्ली में अध्यापन कार्य में संलग्न था। जब कभी मैं दिल के गहराई में कुछ महसूस करता हूँ तो उसे कविता के रूप में पिरो देता हूँ। अभिनय भी मेरा शौक है।
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