गुरुवार, 25 जून 2009

भुगती हुई अंतर्कथा ----


नज़्म सी नाज़ुक
एहसास की टहनी झुकी
विश्वास न जाने क्यूँ
देहरी तक आकर रुकी
भीड़ में ठिठकी हुई
नीड़ की व्यथा
मानवीय संत्रास की
भुगती हुई अंतर्कथा ----
.
अश्क का कुहराम
नयन में आठो पहर
जीजिविषा - संग्राम
शयन में आठो पहर
पहचान सर उठाते नहीं
सागर सा मथा
मानवीय संत्रास की
भुगती हुई अंतर्कथा ----
.
सूक्ष्म संबल हो गया
शहर ये चंबल हो गया
आत्मविश्वास मानो
गरीब का कंबल हो गया
क्लांत परिवेश जैसे
तथागत की 'तथा'
मानवीय संत्रास की
भुगती हुई अंतर्कथा ----

11 टिप्‍पणियां:

  1. क्लांत परिवेश जैसेतथागत की 'तथा'
    ....
    बहुत सुन्दर गम्भीर रचना. शब्दों का अद्भुत समावेश.
    बहुत खूब

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  2. गहन अभिव्यक्ति..एकदम संपूर्ण प्रवाह में.

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  3. mujhe 2 stanza bahot hi accha laga...

    By the way thanks for visiting my blog, sir.

    Regards,
    Mayuri

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  4. samet di chand shabdo me sari vyatha .
    kya kahu? bhugti hui antarkatha !!
    gajab ki shabdo ki jadugari
    bahut bahut badhai apko

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  5. Manveey santrash ki is katha ne to jeevan sangharsh bayan kar diya.....bahut sunder lekhan!

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  6. behtarin rachna.mere blog me amulya tippani ke liye dhanyawaad

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  7. i translated it !!
    the meaning was so powerful I LOVED !! SO MUCH !!!


    check mine please :


    p.s: i started posting my story . hope i see your comment !

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