रविवार, 29 अप्रैल 2012

कथोपकथन हो गया …..


नजर मिली
नजर झुकी
कथोपकथन हो गया
मन बावरा
न जाने किन ख्वाबों में
खो गया
.
‘पत्थर’ ने
पत्थर मारा
चोट लगी
‘पत्थर’ को
पत्थरमय फिर
आसमान हो गया
‘पत्थर’ भी भागे
घर को
.
जुल्म को कभी
सह मत
गलत से
न हो कभी
सहमत
.

10 टिप्‍पणियां:

  1. जुल्म को कभी

    सह मत

    गलत से

    न हो कभी

    सहमत

    ... सहमत हूँ इस विचार से

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  2. कुछ अलग सी पोस्ट सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी

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  3. कविता में शब्दों के प्रयोग अद्भुत हैं।

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  4. गलत से कभी ना हो सहमत !
    सहमत !
    अच्छी लगी शब्दों की हेराफेरी !

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  5. आपकी इस कविता में शब्दों का प्रयोग बहुत प्रभावशाली है। सुंदर एवं सार्थक रचना समय इले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  6. नजर मिली

    नजर झुकी

    कथोपकथन हो गया bahut sunder pangti.....

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  7. main bhee aapse purntaya sahmat hoon..pahli baar aapke blog par aana hu,,,accha laga,,,sader badhayee kesath

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  8. कथोपकथन की बहुत बढ़िया परिभाषा!
    --
    आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उऊपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

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