शुक्रवार, 11 मई 2012

जब से पत्थर इतने रंगीले हो गए …

आईनों के चेहरे
पीले हो गए
जब से पत्थर इतने
रंगीले हो गए
.
आईना
टूटकर बिखर जाता है
जब भी खुद को
आईने के सामने पाता है
.
आईना
उनकी आँखों के ‘आईने’ में
खुद को निहारता है,
वे संवरने आयें
इससे पहले ही
खुद को संवारता है

18 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !
    आईने पर यह प्रयोग बढ़िया लगा ।

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  2. तीनों टुकडे प्रभावी लगे वर्मा जी । बहुत ही खूबसूरत और बहुत ही उम्दा । आईने पर खूबसूरत बातें

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  3. शुभकामनाएं |
    सर जी -
    बेहतरीन रचना ||

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  4. आईनों के चेहरे

    पीले हो गए

    जब से पत्थर इतने

    रंगीले हो गए

    आइना एक निहारने वाले अनेक ,सूरत सके न कोई देख .बहुत बढ़िया बिम्ब हैं आईने के देखने वालों को दिखलाई देने वालों को -

    हर आदमी में होतें हैं दस बीस आदमी ,

    जिसको भी देखना कई बार देखना .
    li.बधाई स्वीकार करें .कृपया यहाँ भी पधारें -
    शनिवार, 12 मई 2012
    क्यों और कैसे हो जाता है कोई ट्रांस -जेंडर ?
    क्यों और कैसे हो जाता है कोई ट्रांस -जेंडर ?
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

    जवाब देंहटाएं
  5. .


    वाह जी वाह !

    आईने को प्रतीक बना कर अच्छी क्षणिकाएं लिखी हैं …
    बधाई !

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  6. आपकी इस उत्कृष्ठ प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार १५ /५/१२ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की गई है |

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. aaina beshak saja sanwara...per wo aayee naa..bahu hee tarah se aaine ka pryaog kiya hai ..sadar badhayee aaur amantran ke sath

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  9. आईना

    उनकी आँखों के ‘आईने’ में

    खुद को निहारता है,

    वे संवरने आयें

    इससे पहले ही

    खुद को संवारता है

    ....लाज़वाब अहसास ! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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