अलाव जलाने को कहकर
'प्रतिकार' का
स्वर लिये
वह
गया था अन्दर,
और
फिर
स्वीकार
का स्वर लेकर
बाहर
आया;
अलाव
जल नहीं पाई तब तक
लकड़ियाँ
सिली हुई थी.
*
हम -
सवालों
के ऊँटपटाँग जवाब देकर
लगाये
रहते हैं यह आस
कि
शायद
कोई
मिल जाये अर्थ ढूँढ़ने वाला
और हम
बन जायें
कालिदास.
rachna pooori tarah nahi samjh aayi verma sir .. :(
जवाब देंहटाएंhan doosra hissa samjh aaya ..lazawaab laga
अच्छा हुआ लकडियाँ सीली हुई थीं ..सब कुछ नहीं जला ...
जवाब देंहटाएंसच है आज सब कालिदास बनने को तैयार बैठे हैं :):)
अच्छी प्रस्तुति
अलाव जल नहीं पाई तब तक लकड़ियाँ सिली हुई थी.
जवाब देंहटाएंदोनो ही रचनायें बेहतरीन हैं।
दोनो ही रचनायें सुन्दर गहरी भाववाभिव्यक्ति। शुभकामनायें।
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