बुधवार, 29 जुलाई 2026

अनकही राहें

 

आम तौर पर
तुम अपने सारे बाल
जूड़े में बाँध लेती हो।

फिर भी
कुछ लटें हर बार
मुक्त रह जाती हैं।

शायद तुम्हें
इसका अहसास भी न हो,
या शायद
तुम ऐसा
जानबूझकर करती हो।

लेकिन
जब तुम मेरे सामने होती हो,
मैं उन्हीं लटों की गिनती में
उलझा रहता हूँ।

और फिर
गिनती वहीं टूट जाती है,
जहाँ तुम्हारी आँखें
मुझसे टकरा जाती हैं।

फुर्सत मिले कभी,
दर्पण में
अपनी आँखों को
ज़रा देर तक निहारना।

शायद तब
तुम्हें भी मालूम पड़े
कि वे
कितना कुछ कह जाती हैं
बिना एक भी शब्द बोले।

और मैं
उन्हीं आँखों के सहारे
तुम्हारे दिल तक
जाने वाली
एक पगडंडी तलाशने लगता हूँ।

8 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद दिलकश... मनमोहक रचना।
    सादर।
    --------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३१ जुलाई २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं