रविवार, 1 नवंबर 2026

अनकही मुकम्मल कविता

 

मैंने जब
स्पर्श और
आलिंगन के
सूक्ष्म आवेगों को
चित्रित किया,

तो देह से
देह तक
एक अनकही
कविता उतरने लगी।

यह कविता
किसी संकलन में
प्रकाशित नहीं हो सकती,

क्योंकि इसे
किसी पाठक की
ज़रूरत नहीं।

पाठक की तलाश में
रची गई रचना
मोहताज हो जाती है
काव्य-तत्वों और शिल्प की।

चलो, लिखें
छुवन की कलम से
एक स्वच्छंद कविता,

जिसके लेखक और पाठक
सिर्फ हम दोनों हों।

और फिर
उसे साँसों में घोलकर
जी लें इस तरह,

कि वह
अनकही ही रहे
और मुकम्मल भी।

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