सब चुप थे,
मैं भी, तुम भी...
सिर्फ़ एक बार
तुमसे नज़र मिली।
शंख नहीं था,
पर
शंखनाद हुआ।
जिसे
सिर्फ़ दो ने सुना—
मैंने और तुमने।
निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....
मैंने जब
स्पर्श और
आलिंगन के
सूक्ष्म आवेगों को
चित्रित किया,
तो देह से
देह तक
एक अनकही
कविता उतरने लगी।
यह कविता
किसी संकलन में
प्रकाशित नहीं हो सकती,
क्योंकि इसे
किसी पाठक की
ज़रूरत नहीं।
पाठक की तलाश में
रची गई रचना
मोहताज हो जाती है
काव्य-तत्वों और शिल्प की।
चलो, लिखें
छुवन की कलम से
एक स्वच्छंद कविता,
जिसके लेखक और पाठक
सिर्फ हम दोनों हों।
और फिर
उसे साँसों में घोलकर
जी लें इस तरह,
कि वह
अधूरी भी रहे
और मुकम्मल भी।
पता नहीं,
तुम डिकोड कर पाई
या नहीं—
अंतिम बार
तुमसे दूर जाने से पहले
मैंने
तुम्हारी अनुमति से
तुम्हारी पीठ पर
भाषा और लिपि रहित
कुछ लिखा था।
और मैं लौटा था
सहेजकर
उस सिहरन को,
जो
मेरी उँगलियों के स्पर्श से
तुम्हारे चेहरे पर
अनायास
उभर आई थी।
याद है—
तुमने
हर बार की तरह
मुड़कर
मुझे जाते हुए
देखा भी नहीं था।
और फिर
जाते हुए भी
मैं जा कहाँ रहा था—
मैं तो
तुम्हारी पीठ पर
एक संदेश की शक्ल में
मौजूद था।
शायद
इसीलिए तुमने
पीछे मुड़कर नहीं देखा।
क्योंकि
कुछ संदेश
पीछे मुड़कर
नहीं पढ़े जाते—
वे
उम्र भर
अपने सिरहाने
रखे जाते हैं।
और फिर
हर रात
सोने से पहले
बिना पढ़े ही
पढ़ लिए जाते हैं।
उस
दिन
जब तल्लीन थे
ज़मीन पर गिरे सूखे पत्ते
अनुवादित करने में
तुम्हारे कंपकंपाते अधरों
के अनबोले बोलों को,
हवा
के भी
कान खड़े हो गए थे
सुनने को—
याद है?
वृक्ष
भी
थोड़ा झुक गया था,
शायद
वह भी जानना चाहता था
तुम्हारे मौन में
छिपे उस प्रेम का
अर्थ।
और
मैं—
तुम्हारे अधरों की
उस कंपकंपी को
अपनी धड़कनों में
सहेज रहा था।
क्या गौर किया था तुमने
बेंच पर मेरी उंगलिया
तुम्हारी उंगलियो से
बिना स्पर्श के भी
कंपकपाते हुए
कुछ अनकहा कह रही थी
उस दिन’जुबान से
कुछ भी तो नहीं कहा था हमने,
फिर भी
न जाने क्यों
आज तक
वह ख़ामोशी
बोलती है।
उसने
एक लिफ़ाफ़ा
थमाया था मुझे।
कहा—
"इसमें
मेरे दिल की वसीयत है,
जो तुम्हारे नाम है।"
मैंने भी
बड़ी नफ़ासत से
उसे
सहेजकर रख लिया।
और कुछ दिनो बाद
जब खोला
वह लिफ़ाफ़ा,
और
वसीयत की शर्तों के अनुसार
उसके दिल को
अपनाना चाहा,
तो देखा—
वसीयत तो थी,
लेकिन
उस पर
उसके
हस्ताक्षर ही नहीं थे।
शायद
हस्ताक्षर करते समय
कलम की निब नहीं,
वक़्त की
मजबूरियों ने
इरादा
तोड़ दिया होगा।
और
दो दिलों के बीच
एक पुल
बनते-बनते
रह गया।
आम तौर पर
तुम अपने सारे
बाल
जूड़े में
बाँध लेती हो।
फिर भी
कुछ लटें हर बार
मुक्त रह जाती
हैं।
शायद तुम्हें
इसका अहसास भी
न हो,
या शायद
तुम ऐसा
जानबूझकर करती
हो।
लेकिन
जब तुम मेरे
सामने होती हो,
मैं उन्हीं
लटों की गिनती में
उलझा रहता
हूँ।
और फिर
गिनती वहीं
टूट जाती है,
जहाँ तुम्हारी
आँखें
मुझसे टकरा
जाती हैं।
फुर्सत मिले
कभी,
दर्पण में
अपनी आँखों को
ज़रा देर तक
निहारना।
शायद तब
तुम्हें भी
मालूम पड़े
कि वे
कितना कुछ कह
जाती हैं—
बिना एक भी
शब्द बोले।
और मैं
उन्हीं आँखों
के सहारे
तुम्हारे दिल
तक
जाने वाली
एक पगडंडी
तलाशने लगता हूँ।
हर तकरार में
तुमसे हार जाता हूँ,
और तुम हर बार
पूरे कमरे में
जीत की मुस्कान लिए फिरती हो।
तुम्हें कभी जाहिर नहीं होने दूँगा
कि तुम्हारी वह मुस्कान
दरअसल
हर बार
मेरी ही जीत होती है।
अभी-अभी
लौटा हूँ
एक तीर्थयात्रा से।
हाँ,
यह बात अलग है कि
उस यात्रा में
मैं न किसी मंदिर गया,
न मस्जिद,
न गुरुद्वारे।
शायद
तुम्हें याद हो—
हम दोनों का
पहला मिलन-स्थल।
मेरे
लिए
वह किसी भी तीर्थ से
कम नहीं।
सहेज
लाया हूँ
वहाँ से
उँगलियों के
प्रथम स्पर्श की
वह संकुचाई-सी थरथराहट।
मिल
गया
वहीं पड़ा हुआ
तुम्हारी चूड़ी का
वह टूटा हुआ टुकड़ा—
जिसे
आज भी
मेरी उतावली उँगलियों का
अपराध याद है।
तुम्हारी कलाई पकड़ते
ही
जो चूड़ी चटक गई थी,
और उसकी किरच से
तुम्हारी कलाई
हल्के-से
रक्ताभ हो उठी थी।
फिर
से जिया
सोपान-दर-सोपान
स्पर्श से
अनकहे आलिंगन तक का
वह सम्पूर्ण सफ़र।
और
लौट आया
अपनी स्मृतियों में
उस तीर्थ का
प्रसाद
लेकर।
तुम्हारी सोहबत का ही असर था,
कि मैं लड़खड़ा रहा था।
मेरी इसी लड़खड़ाहट को देखकर
ट्रैफिक पुलिस ने मुझे रोक लिया।
मुँह से लगाया ब्रेथलाइज़र,
वह हैरान था—
अल्कोहल का स्तर
शून्य था।
मैं मुस्कुरा दिया...
नशे में तो था मैं,
मगर उस नशे में
जो किसी मशीन की ज़द में नहीं आता।
उसे नशा मत कहिए साहिब,
अहले-दिल जानते हैं—
उसे तो सुरूर कहते हैं।
आदमी
देख नहीं सकता,
यदि आँखें न हों।
सुन नहीं सकता,
यदि कान न हों।
बोल नहीं सकता,
यदि मुँह न हो।
लेकिन—
आँखें होते हुए भी
जो देखता नहीं,
कान होते हुए भी
जो सुनता नहीं,
और
मुँह होते हुए भी
जो बोलता नहीं—
ऐसे आदमी
सबसे ज़्यादा मिलते हैं।
वे भीड़ में नहीं खोते,
क्योंकि
भीड़
उन्हीं से बनती है।