हर तकरार में
यूँ तो तुमसे हार जाता हूँ,
और तुम हर बार
पूरे कमरे में
जीत की मुस्कान लिए फिरती हो।
तुम्हें
कभी यह जाहिर नहीं होने दूँगा
कि
तुम्हारी वह मुस्कान
हर
बार
मेरी
ही जीत होती है।
निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....
हर तकरार में
यूँ तो तुमसे हार जाता हूँ,
और तुम हर बार
पूरे कमरे में
जीत की मुस्कान लिए फिरती हो।
तुम्हें
कभी यह जाहिर नहीं होने दूँगा
कि
तुम्हारी वह मुस्कान
हर
बार
मेरी
ही जीत होती है।
अभी-अभी
लौटा हूँ
एक तीर्थयात्रा से।
हाँ,
यह बात अलग है कि
उस यात्रा में
मैं न किसी मंदिर गया,
न मस्जिद,
न गुरुद्वारे।
शायद
तुम्हें याद हो—
हम दोनों का
पहला मिलन-स्थल।
मेरे
लिए
वह किसी भी तीर्थ से
कम नहीं।
सहेज
लाया हूँ
वहाँ से
उँगलियों के
प्रथम स्पर्श की
वह संकुचाई-सी थरथराहट।
मिल
गया
वहीं पड़ा हुआ
तुम्हारी चूड़ी का
वह टूटा हुआ टुकड़ा—
जिसे
आज भी
मेरी उतावली उँगलियों का
अपराध याद है।
तुम्हारी कलाई पकड़ते
ही
जो चूड़ी चटक गई थी,
और उसकी किरच से
तुम्हारी कलाई
हल्के-से
रक्ताभ हो उठी थी।
फिर
से जिया
सोपान-दर-सोपान
स्पर्श से
अनकहे आलिंगन तक का
वह सम्पूर्ण सफ़र।
और
लौट आया
अपनी स्मृतियों में
उस तीर्थ का
प्रसाद
लेकर।
तुम्हारी सोहबत का ही असर था,
कि मैं लड़खड़ा रहा था।
मेरी इसी लड़खड़ाहट को देखकर
ट्रैफिक पुलिस ने मुझे रोक लिया।
मुँह से लगाया ब्रेथलाइज़र,
वह हैरान था—
अल्कोहल का स्तर
शून्य था।
मैं मुस्कुरा दिया...
नशे में तो था मैं,
मगर उस नशे में
जो किसी मशीन की ज़द में नहीं आता।
उसे नशा मत कहिए साहिब,
अहले-दिल जानते हैं—
उसे तो सुरूर कहते हैं।
आदमी
देख नहीं सकता,
यदि आँखें न हों।
सुन नहीं सकता,
यदि कान न हों।
बोल नहीं सकता,
यदि मुँह न हो।
लेकिन—
आँखें होते हुए भी
जो देखता नहीं,
कान होते हुए भी
जो सुनता नहीं,
और
मुँह होते हुए भी
जो बोलता नहीं—
ऐसे आदमी
सबसे ज़्यादा मिलते हैं।
वे भीड़ में नहीं खोते,
क्योंकि
भीड़
उन्हीं से बनती है।
पूरा महकमा हलकान था। शहर में चोरों का तांडव था और हवा में एक अजीब-सी घुटन घुलती जा रही थी। सरकार ने सख्त फरमान जारी किया—“किसी भी कीमत पर आम आदमी को यह भरोसा दिलाया जाए कि उसकी सुरक्षा सर्वोपरि है,” क्योंकि लोकतंत्र में भरोसा भी एक आंकड़ा होता है—वोटों के साथ जुड़ा हुआ।
पुलिस ने आम आदमी की सुरक्षा के नाम पर शहर को सुरक्षा-जाल में लपेट दिया। जगह-जगह बैरकें, चेकपोस्ट और ‘सुरक्षित मार्ग’ बनाए गए—नतीजा यह हुआ कि रास्ते इतने सुरक्षित हो गए कि चलना ही असंभव हो गया। आम आदमी फिर भी कहीं न कहीं चपेट में आता रहा, और अपराधी नियमों की दरारों से मुस्कुराते हुए गुजरते रहे।
आपात बैठक बुलाई गई। फाइलें खुलीं, आँकड़े बोले, और समाधान तलाशा गया। लंबी बहस के बाद एक क्रांतिकारी निर्णय हुआ—अगर अपराध खत्म नहीं हो पा रहा, तो अपराध का “लक्ष्य” ही खत्म कर दिया जाए। यानी आम आदमी को ही किसी सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया जाए।
तर्क सरल था—जहाँ शिकार ही नहीं, वहाँ शिकारी भी नहीं।
योजना तुरंत लागू हुई।
और वह असाधारण रूप से सफल रही।
अब शहर में कोई अपराध नहीं होता।
क्योंकि अब शहर में कोई “आम आदमी” नहीं बचा।
बाकी सब सुरक्षित हैं—अंदर से बंद, और बाहर से “कानूनन सुरक्षित” घोषित जेलों में।
और शहर?
वह अब पूरी तरह शांत है—इतना शांत कि सवाल तक नहीं उठते।