उस
दिन
जब तल्लीन थे
ज़मीन पर गिरे सूखे पत्ते
अनुवादित करने में
तुम्हारे कंपकंपाते अधरों
के अनबोले बोलों को,
हवा
के भी
कान खड़े हो गए थे
सुनने को—
याद है?
वृक्ष
भी
थोड़ा झुक गया था,
शायद
वह भी जानना चाहता था
तुम्हारे मौन में
छिपे उस प्रेम का
अर्थ।
और
मैं—
तुम्हारे अधरों की
उस कंपकंपी को
अपनी धड़कनों में
सहेज रहा था।
क्या गौर किया था तुमने
बेंच पर मेरी उंगलिया
तुम्हारी उंगलियो से
बिना स्पर्श के भी
कंपकपाते हुए
कुछ अनकहा कह रही थी
उस दिन’जुबान से
कुछ भी तो नहीं कहा था हमने,
फिर भी
न जाने क्यों
आज तक
वह ख़ामोशी
बोलती है।













