पता नहीं,
तुम डिकोड कर पाई
या नहीं—
अंतिम बार
तुमसे दूर जाने से पहले
मैंने
तुम्हारी अनुमति से
तुम्हारी पीठ पर
भाषा और लिपि रहित
कुछ लिखा था।
और मैं लौटा था
सहेजकर
उस सिहरन को,
जो
मेरी उँगलियों के स्पर्श से
तुम्हारे चेहरे पर
अनायास
उभर आई थी।
याद है—
तुमने
हर बार की तरह
मुड़कर
मुझे जाते हुए
देखा भी नहीं था।
और फिर
जाते हुए भी
मैं जा कहाँ रहा था—
मैं तो
तुम्हारी पीठ पर
एक संदेश की शक्ल में
मौजूद था।
शायद
इसीलिए तुमने
पीछे मुड़कर नहीं देखा।
क्योंकि
कुछ संदेश
पीछे मुड़कर
नहीं पढ़े जाते—
वे
उम्र भर
अपने सिरहाने
रखे जाते हैं।
और फिर
हर रात
सोने से पहले
बिना पढ़े ही
पढ़ लिए जाते हैं।













