रविवार, 1 नवंबर 2026

अनकही मुकम्मल कविता

 

मैंने जब
स्पर्श और
आलिंगन के
सूक्ष्म आवेगों को
चित्रित किया,

तो देह से
देह तक
एक अनकही
कविता उतरने लगी।

यह कविता
किसी संकलन में
प्रकाशित नहीं हो सकती,

क्योंकि इसे
किसी पाठक की
ज़रूरत नहीं।

पाठक की तलाश में
रची गई रचना
मोहताज हो जाती है
काव्य-तत्वों और शिल्प की।

चलो, लिखें
छुवन की कलम से
एक स्वच्छंद कविता,

जिसके लेखक और पाठक
सिर्फ हम दोनों हों।

और फिर
उसे साँसों में घोलकर
जी लें इस तरह,

कि वह
अधूरी भी रहे
और मुकम्मल भी।

7 टिप्‍पणियां:

Aman Peace ने कहा…

Wah!!

M VERMA ने कहा…

Thanks

Sweta sinha ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Sweta sinha ने कहा…

बेहद रूमानी, भावपूर्ण अभिव्यक्ति सर।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ३ नवंबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

बहुत अच्छी और एकदम सच्ची बात कही है आपने

रेनूप्रिया ने कहा…

बहुत सुंदर