~~दिग्भ्रमित से
उड़ते रहे एहसास मेरे,
चूर-चूर हो रहे
हर पल; हर क्षण
विश्वास मेरे.
तुम इन्हें गर
अपने एहसासों की
छुवन से भीगो दो
तो शायद इन्हें
इनका ठांव मिल जाये
दूर हो भटकन इनकी
गर भोर की उजास लिये
इन्हें इनका गांव मिल जाये

गगन चूमने को आतुर था
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जेठ की दोपहरी में
आँचल को लहराकर
एक छत लिखा है
मिल गया आज
मेरे नाम तुमने जो
ख़त लिखा है
एहसासों के मुँह पर उंगली रख
बोलने से मना कर दिया मैंने
उस ख़त को डायरी में रख
खोलने से मना कर दिया मैंने
मुझे पता है,
उस लिफाफे में महज़ एक
कोरा कागज़ ही होगा
अल्फाज़ कब छोडे हैं
मैंने तुम्हारे पास
कि तुम ख़त लिख सको
वे तो पहले ही चले आए हैं
बादल बेवज़ह तो नही छाये हैं
इस ख़त को तो मैंने
उसी दिन पढ़ लिया था
जब गुमसुम; खामोश तुम
नज़रों से बोल रही थी
फिजा में मिश्री की डली
अनजाने में घोल रही थी
.
नहीं-नहीं ---
नहीं पढ़ पाऊँगा
मैं दूसरा ख़त कोई
उस ख़त को पढ़ लेने के बाद
बेशक,
तुम्हारा ही लिखा क्यों न हो --- ! !
क्या कहा?
आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं
वे शहर लूटने के मनसूबे बना रहे हैं
पर वे तो अभी बहुत दूर हैं
मेरे बाजुओं पर यकीन करो
उनके मनसूबे मैं चूर-चूर कर दूँगा
मुँह-हाथ मैं ज़रा धोने जा रहा हूँ
बहुत थका हूँ
मैं ज़रा सोने जा रहा हूँ।
हालात पर तुम नज़र रखना ----
.
क्या कहा?
आततायी शहर मैं हैं
वे लूट रहे हैं अस्मत
शहर को वो टुकड़ो में बांट रहे हैं
निर्दोषों अबोधों को वे काट रहे हैं
ठहरो, जीत की मैं आधार रख दूँ
मैं अपनी तलवार पर ज़रा धार रख दूँ
अपनी मैं गोटियाँ सजा लूँ
भूखा हूँ
दो चार मैं रोटियां खा लूँ
मैं अभी आता हूँ
हालात पर तुम नज़र रखना ----
.
क्या कहा
आततायी लूट के जा चुके हैं
बेहिसाब ज़ुल्म ढा चुके हैं
मुझे इस शहर से बहुत प्यार है
यह मेरे अस्तित्व का आधार है
मेरी तलवार अब तैयार है
देखते नहीं इसमे अब कितनी धार है
अगली बार मैं ऐसा होने नहीं दूँगा
इस शहर का सुख चैन खोने नहीं दूँगा
जब वे दुबारा आयें
मुझे ख़बर करना
तलवार मैं सिरहाने रखकर
सोने जा रहा हूँ
हालात पर तुम नज़र रखना ----
