तेरी गली से होकर गुजरने लगा है आईना
तेरी हर आहट पर संवरने लगा है आईना
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लटें संवार कर तुम चली गयी पल भर में
जाने क्या सोचकर उछलने लगा है आईना
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जाने कब, कहाँ, किस राह से तुम गुजरो
हर राह में बेसब्र बिखरने लगा है आईना
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उकेरता नहीं किसी और का प्रतिबिम्ब यह
रात ढलते ही देखिये कहरने लगा है आईना
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अक्सर इसका वजूद अनगिनत हो जाता है
नजरों के आईने में उतरने लगा है आईना
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डालती ही क्यूं हो इसपर सवालिया निगाह
टूट जाएगा इसकदर मचलने लगा है आईना
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बेपनाह मुहब्बत का सबूत और क्या होगा
पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना











