मंगलवार, 26 जून 2012

पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना …..

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तेरी गली से होकर गुजरने लगा है आईना

तेरी हर आहट पर संवरने लगा है आईना

.

लटें संवार कर तुम चली गयी पल भर में

जाने क्या सोचकर उछलने लगा है आईना

.

जाने कब, कहाँ, किस राह से तुम गुजरो

हर राह में बेसब्र बिखरने लगा है आईना

.

उकेरता नहीं किसी और का प्रतिबिम्ब यह

रात ढलते ही देखिये कहरने लगा है आईना

.

अक्सर इसका वजूद अनगिनत हो जाता है

नजरों के आईने में उतरने लगा है आईना

.

डालती ही क्यूं हो इसपर सवालिया निगाह

टूट जाएगा इसकदर मचलने लगा है आईना

.

बेपनाह मुहब्बत का सबूत और क्या होगा

पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना

शुक्रवार, 11 मई 2012

जब से पत्थर इतने रंगीले हो गए …

आईनों के चेहरे

पीले हो गए

जब से पत्थर इतने

रंगीले हो गए

.

आईना image

टूटकर बिखर जाता है

जब भी खुद को

आईने के सामने पाता है

.

आईना

उनकी आँखों के ‘आईने’ में

खुद को निहारता है,

वे संवरने आयें

इससे पहले ही

खुद को संवारता है

रविवार, 29 अप्रैल 2012

कथोपकथन हो गया …..

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नजर मिली

नजर झुकी

कथोपकथन हो गया

मन बावरा

न जाने किन ख्वाबों में

खो गया

.

‘पत्थर’ ने

पत्थर मारा

चोट लगी

‘पत्थर’ को

पत्थरमय फिर

आसमान हो गया

‘पत्थर’ भी भागे

घर को

.

जुल्म को कभी

सह मत

गलत से

न हो कभी

सहमत

.

 

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

अब तक तो वो आई ना

चलो मान लिया

कि तुम नहीं

दृष्टिहीन हो,

पर फायदा क्या image

जब तुम्हारे अंदर

दृष्टि ही न हो

*************

बिछा रखा था

जिसके लिये

हर राह में आईना

आस टूटने लगी है

अब तक तो वो

आई ना

***************

ओ री सखी !

अब तो शुरू कर दे

सजना

आ ही रहे होंगे

तुम्हारे

सजना

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

तीन स्थितियां तीन शब्द चित्र

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धूप में

भूखा-प्यासा

जलता रहा सूरज

फिर भी

पूरे दिन

चलता रहा सूरज

.

तुम्हारी चुप्पी के

उस कथन को

सुनता रहा मैं.

सुन न पाया

तदुपरांत जो कुछ

कहती रही तुम.

.

कार्यालय के

पिछली गेट से निकल गए

पार्टी प्रवर्तक

मुख्य द्वार पर

ठगे से खड़े रह गए

सम अर्थक

शुक्रवार, 17 जून 2011

अब तक संचित वह क्षण ..

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तब जबकि

तुम्हारे काँपते हाथों पर

मैनें

अनायास

रख दिया था हाथ;

और फिर

क्षण भर के लिये

प्रकम्पित हो गया था

सम्पूर्ण कायनात,

परिलक्षित हुआ

चिर संचित

सम्पूर्ण चेतना का

अवचेतित स्वरूप

अवशोषित हो गया था

जब पलांश में

सूर्य रश्मि;

वह प्रखर धूप.

तुम चली गयी थी

अनबोले जब

सबकुछ कहकर

वह पावन छवि

नज़र चुराते चितवन की

मधु प्रमत्त मधुकर सा

मंजर वह मदहोश

अब तक संचित वह क्षण

कहाँ मुझे है होश !!

गुरुवार, 16 जून 2011

लाईन सीधी हो गई ...

वह लाईन के कुछ हिस्से को मिटाता और फिर उसे सीधी करने का प्रयास करता. बारम्बार कोशिशों के बावजूद वह सफल नहीं हो पाया. हाँ ! इस प्रयास में लाईन और टेढ़ी होती जा रही थी. अंत में वह खीज गया और पूरी की पूरी लाईन मिटा दिया तथा उसके स्थान पर एक दूसरी लाईन खींच दी. अरे यह क्या ! लाईन तो बिलकुल सीधी हो गई.

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गुरुवार, 9 जून 2011

हमके तू बतावा ... (भोजपुरी)

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देसवा क हमरे समाचार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
कउने खेतवा में चना बोआयल
कइसे बगइचा से लकड़ी ढोआयल
केतना भयल बनिया क उधार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा
.
अबकी कटहर क केकर हौ पारी
बऊर आ गयल होई अमवा के डारी
मचल होई भौरन क गुंजार हो हमके तू बातावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
गेहूं के पानी मीलल की नाहीं
गिरल बरधा अबले हीलल की नाहीं
फूलल होई सरसों अपार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
गउवां के हमरे पुरवैया छुवत होई
टप-टप भोरहरी में महुवा चुवत होई
बीनत होई माई हमार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा


.
घर के खपड़ा पे कदुआ चढ़ल होई
अबकी त बछवा के नाथी नढ़ल होई
भुलाई गइल अमवा क अचार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा
.
बाबु अम्मा हमके जोहत त होइह
अपने बतिया से सबके मोहत त होइह
ओनसे कहा आइब अबकी बार हो हमके तू बतावा
फागुन क ठंडी बयार हो हमके तू बतावा

बुधवार, 1 जून 2011

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद ....

जेठ की दुपहरी में

आंचल लहराकर तुमने

एक छत लिखा है;

मिल गया आज

मेरे नाम जो तुमने

ख़त लिखा है,

एहसासों के मुँह पर

उंगली रख मना कर दिया

कुछ बोलने से;

डायरी में सहेज कर

ख़ुद को मना कर दिया

खत खोलने से.

मुझे पता है

उस लिफाफे में महज़

कोरा कागज़ ही होगा,

अल्फाज़ तो पहले ही

चले आये हैं;

बादल यूँ ही तो नहीं

छाये हैं,

इस खत की हर इबारत

पढ़ लिया था

मैनें तो उसी दिन

जब फ़िजा में मिश्री की डली

अनजाने में तुम घोल रही थी

गुमसुम–खामोश तुम

नज़रों से बोल रही थी

नहीं पढ़ पाऊँगा

कोई दूसरा ख़त

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद

बेशक वह

तुम्हारा लिखा ही क्यों न हो !!

बुधवार, 27 अप्रैल 2011

पहचान – The identity

खुद की पहचान के लिये

उनसे पहचान बनाते-बनाते

मैनें उन्हें पहचान लिया,

और फिर -

पहचान बनते-बनते रह गई.

..

कई बार उन्होनें

पुरजोर कोशिश की

मुझसे पहचान बनाने की,

पर जैसे ही

मुझे पहचाना

पहचान बनते-बनते रह गई.

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सोमवार, 11 अप्रैल 2011

सबसे सुरक्षित स्थान ... (लघुकथा)

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पूरा का पूरा महकमा हलकान परेशान था. अपराधियों का ताण्डव पूरे शहर के वातावरण को दूषित और दुश्वार करता जा रहा था. सरकार ने फरमान जारी कर दिया था कि कुछ भी किया जाये पर किसी भी आम आदमी को नुकसान नहीं पहुँचना चाहिये. आखिर सरकार इन्हीं आम आदमियों के वोटों से ही तो बनती है. पुलिस वाले आम आदमी को सुरक्षा देने के लिये बैरकें लगाकर आवागमन को दुश्वार बना दिये पर परिणाम वही ढाक के तीन पात, आम आदमी फिर भी चपेट में आते जा रहे थे. अपराधी नये नये हथकंडे अपनाकर बेखौफ़ शिकार कर रहे थे. कोई परिणाम निकलता न देखकर आपातकालीन बैठक बुलाई गई. आम आदमी की सुरक्षा के लिये तमाम सम्भावनाओं को खंगाला गया. अंततोगत्वा निर्णय हुआ कि जब तक इन अपराधियों का आतंक कम न हो जाये शहर के तमाम आम आदमियों को किसी सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया जाये, शिकार के अभाव में अपराधी खुद ब खुद पलायन कर जायेंगे. यह उपाय कारगर रहा. अब शहर से किसी भी वारदात की सूचना नहीं मिल रही है. अपराधियों को छोड़कर तमाम आम आदमी शहर के सबसे सुरक्षित स्थान अर्थात जेल के अन्दर जो शिफ्ट किये जा चुके हैं.

बुधवार, 23 मार्च 2011

उद्घाटन ... (लघुकथा)


अभी भवन निर्माण का कार्य सम्पन्न भी नहीं हुआ था पर मंत्रालय से सूचना आ गयी कि कल मंत्री जी भवन का उद्घाटन करने वाले हैं. सारा का सारा महकमा व्यवस्था में लगा हुआ था. भवन के पिछले हिस्से का कार्य चल ही रहा था. अफरा-तफरी के इस माहौल में तय हुआ कि भवन के पिछले हिस्से को ढक दिया जाये और मंत्री जी से भवन के मुख्य द्वार पर फीता कटवाकर उद्घाटन करवा लिया जाये. सारे के सारे मजदूर पीछे के हिस्से में ही रहें, यह जाहिर न होने पाये कि अभी कार्य चल रहा है. तभी सूचना मिली की सभी मजदूर पिछले हिस्से के एक भाग के गिरने से दब गये हैं. आपात मीटिंग बुलाई गई. तय हुआ कि क्योंकि अब समय कम है अत: राहतकार्य तुरंत न शुरू करके उद्घाटन के बाद करवाया जायेगा. सहमति के बीच एक आशंका भी उठी कि कहीं दबे हुए मजदूर उद्धाटन के दौरान ही चीख-पुकार मचाने लग गये तो क्या होगा?


अंततोगत्वा, कुछ अधिकारी घटनास्थल पर पहुँचे और दबे हुए मजदूरों से बोले “तुम्हें हर हालत में अपनी चीख दबाकर रखनी है, हम भवन के उद्घाटन के तुरंत बाद न केवल बाहर निकालेंगे वरन तय मुआवजे से ज्यादा मुआवजा भी दिलवायेंगे”. मजदूर आस के सहारे बिना चीखे पड़े रहे और उद्घाटन समारोह पूर्वक सम्पन्न हो गया. मंत्री ने भवन की आलीशानता की तारीफ की. सफल कार्यक्रम की सम्पन्नता से उत्साहित पूरा विभाग दावत में व्यस्त हो गया. सभी उन दबे मजदूरों को भूल गये. वे मजदूर मुआवजे के सपनों के बीच आज भी वहीं दबे पड़े हैं और विभाग उद्धाटन की दावत में व्यस्त है.

सोमवार, 10 जनवरी 2011

ठूँठ .... (लघुकथा)

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वह अधमरा सा था. उठ भी तो नहीं सकता था. पेड़ की टहनियों को देखा नहीं गया, वे झुककर उसे हवा करने लगीं. उसे श्वास लेने में परेशानी महसूस हो रही थी. पेड़ ने उसके लिये निर्धारित से ज्यादा आक्सीजन का उत्पादन और आपूर्ति किया. .. शायद वह भूखा था, पेड़ ने अपने फलों को खुद से विलग कर उसे परोस दिया. उसके शरीर में थोड़ी हलचल हुई ... वह अब उठकर बैठ गया. ठंडी हवाओं ने, पेड़ की छाँव ने, सुस्वादु फलों ने उसे पुनर्जीवित कर दिया. वह स्वस्थ होकर इधर उधर विचरण करने लगा. अब उसे झोपड़ी की आवश्यकता हुई. उसने पेड़ की शाखों को काटकर उससे झोपड़ी बना लिया. फलों को तोड़कर बाजार में बेच दिया. कुछ ही दिनों में उसे झोपड़ी छोटी लगने लगी. अब उसे मकान की आवश्यकता हुई. उसने मकान बनाने के लिये पेड़ के तने को काट दिया. अकस्मात उसे श्वास लेने में परेशानी हुई. वह आक्सीजन का मास्क पहनकर आजकल उस पेड़ के जड़ को खोदने में व्यस्त है, शायद मकान के साज सज्जा में उन जड़ों की आवश्यकता थी और फिर तने के बिना जड़ ठूँठ सा खड़ा था उसके मकान के सामने ........

सोमवार, 13 दिसंबर 2010

धनिया कहे पियाजी से ~~

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ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लोकोक्तियाँ और कहावते प्रचलित होती हैं. ये गूढ़ अर्थ युक्त होते हैं. बचपन में सुनी एक इसी तरह की कुछ पंक्तियाँ :



"धनिया कहे पियाजी से


सुन लेहसुन मोर बात


सोआ रहा जब पालकी में


जीव गाजर हो जात"


अर्थात धनिया अपने पिया जी से कहती है कि आप मेरी बात सुन लीजिये. जब मैं शादी के बाद घर आते समय आपके साथ पालकी में सोई थी तो मैं अत्यंत लाजमयी हो गई थी.


धनिया : मसाला / धनिया नाम की स्त्री


पियाजी : पिया जी/ प्याज


लेहसुन : लेहसुन / सुन लो


सोआ : सोई / पालक के साथ उगने वाला साग


जीव गाजर हो जात : जी बहुत लजाता था / गाजर

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

अगला धमाका होने तक ..

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आज फिर


बम धमाका हुआ है,


प्रशासन फिर


नींद से जाग गया है.


लाल बत्ती युक्त गाड़ियाँ


फिर दौड़ने लगी हैं सड़कों पर


बैरकें लगा दी गयी हैं,


सड़क पर आवाजाही


प्रतिबन्धित कर दी गई हैं.


फिर


दिनचर्या को बार-बार


उलाहने दिये जायेंगे;


खुफिया कैमरे की


नई प्लान बनेगी;


हर आम आदमी को


रखा जायेगा सन्देह के दायरे में;


पूरा शहर रौशन होगा


कैमरे के फ्लैश से;


प्रायोजित जीजिविषा की तस्वीरें


बाँटी जायेंगी.


सरकार चाक-चौबन्द है


कुछ रातें नज़रों में ही


काटी जायेंगी,


फिर इंतजार किया जायेगा


जीवन सामान्य होने तक


तब तक नींद फिर हाबी होगी


प्रशासन की आँखों में


वह फिर सो जायेगी


अगला धमाका होने तक.


शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

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निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम



अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम


साक्षात मगर हो


दिवा-सपन सी


साहचर्य तुम्हारा


पूस-कपन सी


लजायमान स्पर्श-कामना को स्पर्श-बोध चाहिये


कल-कल-निनाद साधों को ना अवरोध चाहिये


बाधित आतुरता के कोमल भाव सहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


भ्रमर गुंजन सी


श्वासों की लहरी


सम्पूर्ण कायनात


शायद है ठहरी


अनकहे सन्देशों ने जब सब कुछ कह डाला है


फिर क्यूँ इन मृद अधरों पर चुप्पी का ताला है


सागर-मिलन को आतुर लहरों सी बहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


.


.


.






रविवार, 28 नवंबर 2010

तुम शब्द सम्पदा परिपुष्ट मगर ढाई आखर --

तुम दिवास्वप्न, तुम मायावी, तुम यायावर

तुम प्रकम्पित अधरों के बीच अस्फुट स्वर

ढूढ़ रहा मैं ठाँव तुम्हारा

ढूढ़ रहा मैं गाँव तुम्हारा

तुम यहाँ, फिर पलांश में जाने कहाँ गयी

तुम रहस्यमयी, या फिर शायद कालजयी

तुम स्मृतियों की छाया, नित नूतन-नयी

तुम सिहरन हो, कपोत की हो धवल पर

तुम दिवास्वप्न, तुम मायावी, तुम यायावर

तुम प्रकम्पित अधरों के बीच अस्फुट स्वर

एक झलक आस में हूँ

विचलित हूँ संत्रास में हूँ

तुम सघन तिलस्म हो या फिर छलावा हो

तप्त भूगर्भी रत्नों की पिघली हुई लावा हो

तुम नदी हो, सागर-लहरो की बुलावा हो

तुम शब्द सम्पदा परिपुष्ट मगर ढाई आखर

तुम दिवास्वप्न, तुम मायावी, तुम यायावर

तुम प्रकम्पित अधरों के बीच अस्फुट स्वर

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

अपना एक स्टाईल रक्खो

कौमी एकता सप्ताह के अंतर्गत आयोजित कवि गोष्ठी में एक छोटी सी गजल पढने का अवसर मिला. आप भी सुनें ...

अपना एक स्टाईल रक्खो



शनिवार, 20 नवंबर 2010

एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?

[IMG000006.jpg] क्षितिजा जी की बेहद खूबसूरत रचना उफ़ !! के कमेंट में मैनें एक शेर लिखा जिसके प्रतिक्रिया में उनका ईमेल आया :


"वर्मा जी ... आपके कमेन्ट के लिए शुक्रिया ... आप एक बहुत खूबसूरत शेर के साथ अपना कमेन्ट छोड़ कर आयें हैं ... एक गुज़ारिश है ... उसमें चंद शेर और जोड़ कर ग़ज़ल पूरी ज़रूर कीजियेगा ... शुक्रिया"


गुज़ारिश की कद्र और शुक्रिया अदा करते हुए कोशिश किया और जो कुछ बन पड़ा आपके सामने है :



एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?


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मत पूछिए ये दिल चाक-चाक क्यूँ है


एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?


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हालात का तर्जुमा तुम्हारी निगाहों में है


दर्द को छुपाने की फिर फिराक़ क्यूँ है?


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तुम्हारे आँकड़ों पर यकीन करें भी कैसे?


ज़हर भरा आख़िर फिर खुराक़ क्यूँ है?


.


माना परिन्दे छोड़े गये हैं उड़ान भरने को


नकेल से बँधी फिर इनकी नाक क्यूँ है?


.


खुद संभल जाओगे मत माँगो सहारा


रहनुमा में शुमार ओबामा बराक क्यूँ है?


शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

‘यशस्वी भव’ ‘विजयी भव’ ~~

जा रहा था

उसका बेटा ‘समर’ में

पहनकर सेना की

वरदी

नयनों में सागर समेटे

उसकी माँ

‘यशस्वी भव’

और ‘विजयी भव’ का

वर दी

.

प्रसंग चल रहा था

सुग्रीव और

बालि का

तन्मय होकर

देख रही थी

बालिका

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