गुरुवार, ८ अक्तूबर २००९

एहसासों की छुवन ~~

~~
धूल के मानिन्द
दिग्भ्रमित से
उड़ते रहे एहसास मेरे,
चूर-चूर हो रहे
हर पल; हर क्षण
विश्वास मेरे.
तुम इन्हें गर
अपने एहसासों की
छुवन से भीगो दो
तो शायद इन्हें
इनका ठांव मिल जाये
दूर हो भटकन इनकी
गर भोर की उजास लिये
इन्हें इनका गांव मिल जाये
~~~

गुरुवार, २४ सितम्बर २००९

रावण फ़िर अस्तित्व ले रहा है ~~~


रावण अस्तित्व ले रहा है
हर रामलीला ग्राऊँड के बाहर
न जाने कितने कारीगर लगाये गये हैं
पिछले साल से बड़ा रावण बनाने के लिये
कोई इसका हाथ बना रहा है
कोई धड़, कोई सिर तो कोई पैर
कोई इसका जिस्म बना रहा है
कोई इसका तिलिस्म बना रहा है
अभी यह पड़ा रहेगा
पर एक दिन यह खड़ा हो जायेगा
देखते देखते कद में
राम से बड़ा हो जायेगा
तय है कि इस बार भी यह
राम के हाथों मारा जायेगा
फिर इसका दहन होगा
इस तरह परम्परा निर्वहन होगा

हम क्यूँ भूल जाते हैं
रावण के मायावी स्वरूप को
जब राम का तीर चलेगा
वह हमारे बीच ही बैठा देख रहा होगा
हमारे द्वारा ही बनाये
रावण के पुतले के ढहन को
और फिर उसके दहन को

हर बार की तरह इस बार भी
राम का निशाना चूक जायेगा
रावण फिर नही मरेगा
वह वर्षपर्यंत अट्टहास करेगा
और फिर अगले साल फिर ----

सोमवार, २१ सितम्बर २००९

किसी के मरने की खबर नहीं है ~~

~~~
गगन चूमने को आतुर था
यह अधबना मकान
सहसा धराशायी हो गया
आश्रय देने को आतुर था
पलांश मे आततायी हो गया
हम भी तो आदी हैं
ढहन देखने को
हर बार हम बनाते हैं
एक नई लंका
लंकादहन देखने को
हमारी आँखें तलाशती हैं
बिखरी हुई रक्ताभ ईटें
मांस के लोथड़े और रक्त की छीटें
आज के इस हादसे में
किसी के मरने की खबर नहीं है
बेशक ईंटों के बीच दबी हैं
कुछ सस्ती चूनर;
कुछ सिसकियाँ
कुछ मासूमों की चीखें
पर इनमें खून का
कोई निशान नहीं हैं
यकीनन इस हादसे में
कोई जान नहीं है
*
शायद वे खून को
पहले ही चट कर चुके हैं
शायद वे इस सीन को
पहले ही कट कर चुके हैं

गुरुवार, १३ अगस्त २००९

चलो अब इसमें संस्कार बोऊँ !!

~~~~~~~
वह असंस्कारित था
मैने उसे संस्कार देना चाहा
मैंने उसे जिन्दगी का
सार देना चाहा
मैने कहा बोलो 'प्रणाम'
वह फुसफुसाया
अपनी जुबान हिलाया
और बोला 'रोटी'
मैं समझ गया कि
वह भूखा है
मैने उसे रोटी खिलाई
ठंडा पानी पिलाया

वह शातिर था -
वह अपनी भूख को भुना रहा था

वह अब गुनगुना रहा था
मुझे लगा
अब शायद प्रयास में सफल होऊँ
चलो अब इसमें संस्कार बोऊँ

*
मैने कहा बोलो 'प्रणाम'
वह फिर फुसफुसाया
अपनी जुबान हिलाया
और बोला 'बोटी'

~~~~

शनिवार, ८ अगस्त २००९

--- सुरूर छाता है ! ! ( रोटी ने तवे से जो कहा मैंने सुना)


*
रोटी ने तवे से कहा
तुम्हारा अस्तित्व तो
बहुत करामाती है
तुम्हारी आँच मुझको तो
बहुत भाती है
तुम्हारे वजूद ने
मुझको सपन दिया है
सच कहूँ तो
एक मीठी सी तपन दिया है
तवा बोला
पर ये आग मेरा नहीं है
मैं तो महज़ वाहक हूँ
तुम्हारे और चूल्हे के बीच
मैं तो नाहक़ हूँ
चीत्कार कर उठी रोटी --
नहीं -- नहीं !!
मुझे चूल्हे की आग से क्या लेना
उसकी आग तो झुलसाती है
मेरे शफ्फाक़ वज़ूद पर
दाग दे जाती है
वाहक कभी नाहक़ नहीं होता
मुझे तो
तुम्हारी ही आग में सिकना भाता है
तुम्हारे अस्तित्व से लिपटकर
एक सुरूर सा छाता है.

--- सुरूर छाता है
*

सोमवार, ३ अगस्त २००९

---- शायद तुम आ जाओ #



उस दिन तय था कि
हम मिलेंगे
इसी दरख्त के नीचे
परिन्दों की चहकन सुनते हुए
बैठा रहा मैं ख्वाब बुनते हुए
समय के भान से परे हो गया था
और -----
----- और तुम नहीं आई
.
आज जबकि तय है कि
तुम नहीं मिलोगी
इस दरख्त के नीचे
तनहा आँखें मीचे
परिन्दों की चहकन सुनते हुए
बैठा रहा हूँ मैं ख्वाब बुनते हुए
समय के भान से परे हूँ मैं
शायद ----
---- शायद तुम आ जाओ
.
आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----

रविवार, २६ जुलाई २००९

ख़त फ़िर मेरे हाथ में है --


एक ख़त
जो लिखा था
मैंने तुम्हे कभी
वो ख़त आज फिर
मेरे हाथ में है
ख़त लिखकर
छा गया था
दिलो-दिमाग पर
बेइंतिहा सुरूर
शायद मन में था
कहीं न कहीं
तुम्हे ख़त लिखने पर गुरूर
मुझे याद है उस दिन
ख़त लिखकर
ख़त को अनायास मैंने
चूम लिया था
इतना हल्का हो गया था कि
ख़ुद का भी भान नहीं था
लिफाफे पर क्या लिखूं
इसका भी ध्यान नहीं था
लिफाफे को मैंने
एहसास से सजाया था
पर गलती से
तुम्हारे पते की जगह
ख़ुद का पता लिख आया था
और आज जब
डाकिया ख़त लाया तो --
.
एक ख़त
जो लिखा था
मैंने तुम्हे कभी
वो ख़त आज फिर
मेरे हाथ में है

शनिवार, १८ जुलाई २००९

माँ एहसास है --


माँ एक शब्द नहीं
एहसास है
एक अटूट रिश्ता;
एक विश्वास है
कभी देखना गौर से
बच्चे के लिये
स्वेटर बुनते हुए उसे
ऊन को जब वह
तीलियो से उलझाती है
अपने मन की अनगिनत गांठ
खोलती है; सुलझाती है
लोरियां गाती है
सारी रात नहीं सोती है
पर बच्चे की पलकों पर
सपन बोती है
कितना बेफिक्र होता है बच्चा
जब माँ आसपास है
माँ एक शब्द नहीं ---
बच्चा जब संत्रास में होता है
अधबने मकान सा
माँ ढह जाती है
बच्चे के आंसुओं संग
खुद ही बह जाती है
ममतामयी माँ तो
अमलतास है
माँ एक शब्द नहीं
एहसास है
एक अटूट रिश्ता;
एक विश्वास है

.

शनिवार, ११ जुलाई २००९

निरावेशन की शून्यता मंजूर नहीं --


तुम प्रोटोन
मैं इलेक्ट्रोन
तुम्हारा आकर्षण
खींचता है मुझे तुम्हारी ओर
अनवरत; निरंतर
पर मैं आर्बिट से आबध्द
तुम्हारी ओर
आ भी तो नहीं सकता
.
तुम आवेशित;
मैं आवेशित
फिर बीच में क्यों है
न्यूट्रोन निरावेशित
उफ़! मैं तुमसे दूर
जा भी तो नहीं सकता
शायद,
तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमना
मेरी नियति है
क्योंकि तुमसे मिलते ही
हम दोनों का समस्त आवेश
शून्य हो जाएगा
.
नहीं-नहीं !!
निरावेशन की
शून्यता मुझे मंजूर नहीं है
बेशक मैं
घूमता रहूँगा तुम्हारे इर्द-गिर्द
ताउम्र बिना रुके; निरंतर ---

रविवार, ५ जुलाई २००९

तलाश जलते तवे की ----!!


जलते तवे पर
एक बूँद सा मैं जला.
पलांश में आया
भयानक जलजला
और मैं,
भाप बनकर उड़ चला
शायद दिल में हसरत थी
बादल बनने की;
तुम्हारे छत पर
चादर सा तनने की
भीगो देना चाहता था
तुम्हारा छत;
बरसना चाहता था
अनवरत
तुम जहां आकर
गुनगुनाती हो
हर बारिश के साथ
भीग जाती हो.
पर शायद
वायुदाब की कमी थी
या शायद
मेरे अन्दर ‘आब’ की कमी थी
बादल नहीं बन पाया
तरसता रह गया बरसने को

आज फिर अपने अन्दर
और अधिक आब इकट्ठा करके
किसी जलते तवे को तलाश रहा हूँ
तय है कि एकदिन मैं
बादल बनूंगा
बरसूंगा तुम्हारे छ्त पर
मैं सावन ----

गुरुवार, २ जुलाई २००९

एक कबूतर दब गया था ----


तुमने कहा --
रूको, मत जाओ
मैनें समझा --
रूको मत, जाओ
और मैं
चुपचाप चला आया था -- उस दिन
बिना किसी शोर
बिना किसी तूफान
कितना भयानक
ज़लज़ला आया था -- उस दिन
काश !
तुमने देखा होता
चट्टान का खिसकना
काश !
तुमने भी देखा होता
वह मंजर
जब एक मकान
ढहा था अधबना
और
उड़ने को आतुर एक कबूतर
दब गया था
शायद यह --
‘वैयाकरण’ की साजिश थी

सोमवार, २९ जून २००९

चार दुधमुहे बच्चे मरे हैं ---


ये आग जो लगी है
जल्दी काबू कर ली जाती
पर क्या करें सभी कर्मचारी अभी तक तो
पिछली लगी आग को ही बुझा रहे हैं
वे तो बहुत मसरूफ हैं
आग फ़िर न लगे इसके उपाय सुझा रहे हैं
और फ़िर
इतनी बड़ी आग पर जल्दी काबू पाना भी
आग की तौहीन है
आग तो आग है
इसका क्या!
यह कभी लग जाती है
तो कभी लगाई जाती है
इसी तरह तो
सोती कौम जगाई जाती है
गनीमत है कि हादसा बड़ा नहीं हुआ
अब तक कोई मुद्दा खड़ा नहीं हुआ
क्या कहा 'कैजुअल्टी' ?
अरे! वह तो न के बराबर है
सिर्फ़ चार दुधमुहे बच्चे मरे हैं
बाकी सब पहले भी अधमरे थे
आज भी अधमरे हैं
एक झोपडी में सो रहा
उसका बाप मारा है
मैं तो कहता हूँ
सिसक-सिसक कर जी रहा था
यूँ समझो कोई पाप मारा है
वह जो कोने में बैठी है चुपचाप
अरे वही
जो अधजली चुनर से लिपटी है
जी हाँ !
जिसकी पिछले महीने शादी हुई थी
उसका निठल्ला पति मरा है
बाकी सब ठीक है
माहौल बस डरा-डरा है
.
अजी! आग अभी बुझाये कैसे
अभी 'उनको' भी आना है
आग बुझाने का उद्घाटन तो
उन्हीं से करवाना है
वे आते ही कम्बल बाटेंगे
आश्वासन और संबल बाटेंगे
ये कितने खुशकिस्मत हैं
इन्हे तो 'लाइव' दिखाया जाएगा
आग के बीच दम तोड़ता
इनका 'लाइफ' दिखाया जाएगा
वो जिंदा ही कहाँ था
जो अभी-अभी मरा है
माहौल बस डरा-डरा है
माहौल बस -----

शनिवार, २७ जून २००९

परिभाषाओं की बही -----


कुछ भी करिए
सब सही है
देखते नहीं मेरे हाथ में
परिभाषाओं की बही है!
मेरे अपने जब करते हैं तो
बलात्कार को भी मैं
'स्वीकार' लिखता हूँ
किसी और के लिए तो
गुफ्तगू को भी मैं
'अनाचार' लिखता हूँ
सच के खिलाफ पल में
झूठ की गवाही दिला देता हूँ
जानता हूँ इस तथ्य को कि
सच के पक्ष में
कोई सच खड़ा नहीं होगा
आदमकद झूठ के कद से
सच का कद बड़ा नहीं होगा
तुम बेफिक्र रहो
मेरी जिरह से तो
सच 'सच' को भी पहचानने से
मना कर देगा
हैवानियत पल में
इंसानियत को
फ़ना कर देगा
कुछ इस तरह मैं
जीवन का सार लिखूंगा
जरूरत पड़ने पर कलम को
संहारक हथियार लिखूंगा
बेखौफ रहिए
सब सही है
जब तक मेरे हाथ में
परिभाषाओं की बही है -----

गुरुवार, २५ जून २००९

भुगती हुई अंतर्कथा ----


नज़्म सी नाज़ुक
एहसास की टहनी झुकी
विश्वास न जाने क्यूँ
देहरी तक आकर रुकी
भीड़ में ठिठकी हुई
नीड़ की व्यथा
मानवीय संत्रास की
भुगती हुई अंतर्कथा ----
.
अश्क का कुहराम
नयन में आठो पहर
जीजिविषा - संग्राम
शयन में आठो पहर
पहचान सर उठाते नहीं
सागर सा मथा
मानवीय संत्रास की
भुगती हुई अंतर्कथा ----
.
सूक्ष्म संबल हो गया
शहर ये चंबल हो गया
आत्मविश्वास मानो
गरीब का कंबल हो गया
क्लांत परिवेश जैसे
तथागत की 'तथा'
मानवीय संत्रास की
भुगती हुई अंतर्कथा ----

मंगलवार, २३ जून २००९

तुम पुनर्नवा हो क्या -----?


तुम
आसपास कहीं नहीं पर
तुम्हारे ख़याल की आहट से
सरगोशियां होती हैं
शाख-ए-वज़ूद को मेरे
तुम हिला देती हो
कुछ अधमरे एहसासों को
तुम जिला देती हो
तुम हवा हो क्या-----?

तुम
ज़ुबान से दिलासा नहीं देती
नज़र की छुवन से ही
सकूं दे जाती हो
और मैं सो जाता हूं
सपन की आहटों के बीच
तुम नज़र आती हो जब
शोख़ लटकी-लटों के बीच
तुम दवा हो क्या -----?


तुम
जिस दर्द के पास से गुजरी
वो दर्द फिर दर्द न रहा
पत्थर था मैं पर
पानी सा बहा
नब्ज छूकर नहीं देखी
बयां कर दी हाले-दिल मेरा
तुम पुनर्नवा हो क्या -----?

शनिवार, २० जून २००९

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद ----


जेठ की दोपहरी में

आँचल को लहराकर

एक छत लिखा है

मिल गया आज

मेरे नाम तुमने जो

ख़त लिखा है

एहसासों के मुँह पर उंगली रख

बोलने से मना कर दिया मैंने

उस ख़त को डायरी में रख

खोलने से मना कर दिया मैंने

मुझे पता है,

उस लिफाफे में महज़ एक

कोरा कागज़ ही होगा

अल्फाज़ कब छोडे हैं

मैंने तुम्हारे पास

कि तुम ख़त लिख सको

वे तो पहले ही चले आए हैं

बादल बेवज़ह तो नही छाये हैं

इस ख़त को तो मैंने

उसी दिन पढ़ लिया था

जब गुमसुम; खामोश तुम

नज़रों से बोल रही थी

फिजा में मिश्री की डली

अनजाने में घोल रही थी

.

नहीं-नहीं ---

नहीं पढ़ पाऊँगा

मैं दूसरा ख़त कोई

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद

बेशक,

तुम्हारा ही लिखा क्यों न हो --- ! !

शुक्रवार, १९ जून २००९

नदी नहा कर पोछ रही बदन --- (शब्द चित्र)


मुहअंधेरे- भोर में,

नदी नहा कर

पोंछ रही थी बदन

सूरज की आँख खुल गयी

नज़ारा देख शर्म से लाल हुआ

बढ़ने लगी तपन

-------------------

हवाएं

सरसराते हुए

चुपके से

शाखों को झुला रहीं थी झूला

सूरज ने देख लिया

हो रहा है --

आगबबूला

बुधवार, १७ जून २००९

सारी दास्ताँ बयाँ कर गयीं ----


मैं

तुम

मदहोश

फिर भी

खामोश;

गुमसुम

मगर ये

चुगलखोर तुम्हारी

वाचाल कुमकुम

ये क्या कर गयीं

सारी दास्तान

बयाँ कर गयी --

सोमवार, १५ जून २००९

आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं --

क्या कहा?

आततायी शहर की तरफ़ आ रहे हैं

वे शहर लूटने के मनसूबे बना रहे हैं

पर वे तो अभी बहुत दूर हैं

मेरे बाजुओं पर यकीन करो

उनके मनसूबे मैं चूर-चूर कर दूँगा

मुँह-हाथ मैं ज़रा धोने जा रहा हूँ

बहुत थका हूँ

मैं ज़रा सोने जा रहा हूँ।

हालात पर तुम नज़र रखना ----

.

क्या कहा?

आततायी शहर मैं हैं

वे लूट रहे हैं अस्मत

शहर को वो टुकड़ो में बांट रहे हैं

निर्दोषों अबोधों को वे काट रहे हैं

ठहरो, जीत की मैं आधार रख दूँ

मैं अपनी तलवार पर ज़रा धार रख दूँ

अपनी मैं गोटियाँ सजा लूँ

भूखा हूँ

दो चार मैं रोटियां खा लूँ

मैं अभी आता हूँ

हालात पर तुम नज़र रखना ----

.

क्या कहा

आततायी लूट के जा चुके हैं

बेहिसाब ज़ुल्म ढा चुके हैं

मुझे इस शहर से बहुत प्यार है

यह मेरे अस्तित्व का आधार है

मेरी तलवार अब तैयार है

देखते नहीं इसमे अब कितनी धार है

अगली बार मैं ऐसा होने नहीं दूँगा

इस शहर का सुख चैन खोने नहीं दूँगा

जब वे दुबारा आयें

मुझे ख़बर करना

तलवार मैं सिरहाने रखकर

सोने जा रहा हूँ

हालात पर तुम नज़र रखना ----

रविवार, १४ जून २००९

अगली बार जब तुम मुझसे मिलना - -


अगली बार
जब तुम मुझसे मिलना
तन नहीं
तुम अंतर्मन हो जाना
तेरा एहसास
बन जाए मेरी साँस
इतनी तुम सघन हो जाना
अगली बार
जब तुम मुझसे मिलना
मुझे पहचानना मत
मत करना कोई वायदा
मत छूना मुझे छुवन से
गुजरने देना मुझे
अनजानी चुभन से
अगली बार
जब मुझसे मिलना
तुम अगन हो जाना
परिंदों सा
मैं जलना चाहता हूँ
तुम्हारी सपन पलकों पर रख
कुछ कदम चलना चाहता हूँ
या शायद
लड़खड़ाते कदमों के बल
मैं संभलना चाहता हूँ

अगली बार
जब तुम मुझसे मिलना ---