जेठ की दुपहरी में
आंचल लहराकर तुमने
एक छत
लिखा है;
मिल
गया आज
मेरे
नाम जो तुमने
ख़त
लिखा है,
एहसासों
के मुँह पर
उंगली
रख मना कर दिया
कुछ
बोलने से;
डायरी
में सहेज कर
ख़ुद
को मना कर दिया
खत
खोलने से.
मुझे
पता है
उस
लिफाफे में महज़
कोरा
कागज़ ही होगा,
अल्फाज़
तो पहले ही
चले
आये हैं;
बादल
यूँ ही तो नहीं
छाये
हैं,
इस खत
की हर इबारत
पढ़
लिया था
मैनें
तो उसी दिन
जब
फ़िजा में मिश्री की डली
अनजाने
में तुम घोल रही थी
गुमसुम–खामोश तुम
नज़रों
से बोल रही थी
नहीं
पढ़ पाऊँगा
कोई
दूसरा ख़त
उस ख़त
को पढ़ लेने के बाद
बेशक
वह
तुम्हारा
लिखा ही क्यों न हो !!
