प्रवाह

निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....

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बुधवार, 1 जून 2011

उस ख़त को पढ़ लेने के बाद ....

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जेठ की दुपहरी में आंचल लहराकर तुमने एक छत लिखा है ; मिल गया आज मेरे नाम जो तुमने ख़त लिखा है , एहसासों के मुँह पर उंगली रख...
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M VERMA
वाराणसी में पला-बढ़ा, दिल्ली में अध्यापन कार्य में संलग्न था। जब कभी मैं दिल के गहराई में कुछ महसूस करता हूँ तो उसे कविता के रूप में पिरो देता हूँ। अभिनय भी मेरा शौक है।
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