प्रवाह

निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....

बुधवार, 23 मार्च 2011

उद्घाटन ... (लघुकथा)

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अभी भवन निर्माण का कार्य सम्पन्न भी नहीं हुआ था पर मंत्रालय से सूचना आ गयी कि कल मंत्री जी भवन का उद्घाटन करने वाले हैं. सारा का सारा महकम...
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सोमवार, 10 जनवरी 2011

ठूँठ .... (लघुकथा)

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वह अधमरा सा था. उठ भी तो नहीं सकता था. पेड़ की टहनियों को देखा नहीं गया, वे झुककर उसे हवा करने लगीं. उसे श्वास लेने में परेशानी महसूस हो र...
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सोमवार, 13 दिसंबर 2010

धनिया कहे पियाजी से ~~

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ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ लोकोक्तियाँ और कहावते प्रचलित होती हैं. ये गूढ़ अर्थ युक्त होते हैं. बचपन में सुनी एक इसी तरह की कुछ पंक्तियाँ :...
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बुधवार, 8 दिसंबर 2010

अगला धमाका होने तक ..

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आज फिर बम धमाका हुआ है, प्रशासन फिर नींद से जाग गया है. लाल बत्ती युक्त गाड़ियाँ फिर दौड़ने लगी हैं सड़कों पर बैरकें लगा दी गयी ...
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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

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निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम साक्षात मगर हो दिवा-सपन सी साहचर्य तुम्हारा पूस-...
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रविवार, 28 नवंबर 2010

तुम शब्द सम्पदा परिपुष्ट मगर ढाई आखर --

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तुम दिवास्वप्न , तुम मायावी , तुम यायावर तुम प्रकम्पित अधरों के बीच अस्फुट स्वर ढूढ़ रहा मैं ठाँव तुम्हारा ढूढ़ रहा मैं गाँव तुम्हारा ...
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शनिवार, 20 नवंबर 2010

एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?

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क्षितिजा जी की बेहद खूबसूरत रचना उफ़ !! के कमेंट में मैनें एक शेर लिखा जिसके प्रतिक्रिया में उनका ईमेल आया : "वर्मा जी ... आपके कम...
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शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

‘यशस्वी भव’ ‘विजयी भव’ ~~

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जा रहा था उसका बेटा ‘ समर ’ में पहनकर सेना की वरदी नयनों में सागर समेटे उसकी माँ ‘ यशस्वी भव ’ और ‘ विजयी भव ’ का वर दी ...
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शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

धुन्ध के उस पार

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दिख नहीं रहा धुन्ध के उस पार कुछ भी , पर ‘ उस पार ’ यकीनन कुछ न कुछ सारगर्भित होगा. भागता हूँ अन्धाधुन्ध , पार करना ही है य...
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शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

कायनात का प्रकम्पन ....

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आज भी यथारूप सहेज रखा है मैने स्मृतियों के तहखाने में अनायास और अकस्मात अर्जित तुम्हारे उस स्पर्श को , जिसने न केवल मेरे वजूद ...
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बुधवार, 13 अक्टूबर 2010

वटवृक्ष पर मेरी कविता ....

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कबूतर तुम कब सुधरोगे
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मंगलवार, 5 अक्टूबर 2010

शायद हम बन जायें कालिदास ~~

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अलाव जलाने को कहकर ' प्रतिकार ' का स्वर लिये वह गया था अन्दर , और फिर स्वीकार का स्वर लेकर बाहर आया ; अलाव जल नहीं पा...
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शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2010

मुट्ठी में रेत .....

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सम्बंधों से छिन गये हैं उनके आयाम अनुबन्धों को रात-दिन कर रहे प्रणाम विसंगतियों के हर तरफ अंश पल रहे बबूल सरीखे दिल में दंश पल र...
17 टिप्‍पणियां:
शनिवार, 25 सितंबर 2010

बिखरे हुए एहसास ....

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सरसों सरीखे - अतिसूक्ष्म कुछ एहसास बिखर गये थे उस दिन   तुम्हारी देहरी के इर्द-गिर्द , मैं जानता हूँ ये तुम्हें नज़र नहीं आय...
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M VERMA
वाराणसी में पला-बढ़ा, दिल्ली में अध्यापन कार्य में संलग्न था। जब कभी मैं दिल के गहराई में कुछ महसूस करता हूँ तो उसे कविता के रूप में पिरो देता हूँ। अभिनय भी मेरा शौक है।
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