सोमवार, 1 जून 2009

ख़बर ये है कि ----------


ख़बर ये है कि

ख़बरों में वो ही नहीं

जिनकी ये ख़बर है

.

डर से ये

कहीं मर न जाएं

बस यही डर है

.

लूटेरे भी

लूटेंगे किसको?

लुटा हुआ ये शहर है

.

दवा भला

असर करे कैसे?

शीशियों में तो ज़हर है

.

मंजिल तो

इस रास्ते पर है ही नहीं

अँधा ये सफर है

.

खौफजदा,

गुमनाम सा, दुबका हुआ

ये शेरे-बबर है

.

नाम तो है

पर बताये कैसे?

खौफ का इतना असर है

.

मुआवजा तो खूब मिला

पर उनको नहीं

जिनके उजड़े घर हैं

3 comments:

रज़िया "राज़" ने कहा…

.दवा भला असर करे कैसे?शीशियों में तो ज़हर है.
bahot khub, vaah kya kahne?

dr. ashok priyaranjan ने कहा…

अच्छा लिखा है आपने । भाव और विचार के स्तर पर अभिव्यक्ति प्रखर है ।
मैने अपने ब्लाग पर एक लेख लिखा है-फेल हो जाने पर खत्म नहीं हो जाती जिंदगी । समय हो तो पढ़ें और अपना कमेंट भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लूटेरे भी
लूटेंगे किसको?
लुटा हुआ ये शहर है

आज के हालात पर बहुत बेबाक टिपण्णी करती चलती है आपकी ये रचना...बहुत सादे शब्दों के सहारे बहुत गहरी बात की है आपने...बधाई...
नीरज

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