शुक्रवार, 5 जून 2009

चौराहे पर लाश ---


उसकी लाश

चौराहे पर पड़ी हैं

गिद्धों की निगाहें

उसपर गड़ी हैं

सड़ांध --

बदबू --

रक्त की धार --

कोई नहीं जानता

किसने उसको मारा

हर तमाशबीन के हाथ में

बंद है एक नारा

सभी तज़बीज़ रहे हैं

कब मुट्ठी खोलने का वक्त आए!

सब इस ताक में हैं

उसका हाथ सबसे ऊँचा लहराए!

लोगों को उसके रिश्तेदारों की तलाश है

पर यह तो शायद

एक लावारिस लाश है

मुनिसिपलिटी की गाड़ी

ओके बाय-बाय टाटा

और फिर वही सन्नाटा

.

संस्कार यूँ ही मरते हैं

मरेंगे !

हम विरोध यूँ ही करते हैं

करेंगे !

अगले चौराहे पर

एक लाश और पड़ी मिलेगी

फिर गिद्धों की निगाहें

उसपर गड़ी मिलेगी

भीड़ फिर इसी तरह

खड़ी मिलेगी

जी हाँ!

भीड़ खड़ी मिलेगी

6 comments:

श्यामल सुमन ने कहा…

संवेदना को झकझोरनेवाली रचना। सचमुच भावनाएँ तो मर ही रहीं हैं।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

vandana ने कहा…

bahut hi samvedansheel rachna........andar tak jhakjhor gayi.

islamic hindi web ने कहा…

वह क्या खूब लिखा है

karuna ने कहा…

मन को झकझोरने वाली रचना है साथ ही समाज के संस्कार विहीन रूप को प्रस्तुत करती है |

M Verma ने कहा…

श्यामल जी, वन्दना जी, करूणा जी व इस्लामिक हिन्दी वेब
आप सब की उर्वर प्रतिक्रियाओ ने हौसला बढाया.
धन्यवाद्

Harkirat Haqeer ने कहा…

बहुत अच्छा प्रयास .....!!

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