रविवार, 7 जून 2009

कहीं बात आम न हो जाए --


सागर की
बादलों से हुई
खामोश गुफ्तगू को
एक लहर ने सुना
मन ही मन
कुछ गुना
और यह बात
शहर से कहने को चुना
वह था बेहद भावविभोर
तभी तो
करता हुआ शोर
भागा किनारे की ओर
---
सागर को हुआ संकोच
कहीं बात आम न हो जाए
वह बिना बात के
बदनाम न हो जाए
उसने, उसे
रोकने का फैसला किया
देखो -
सैकडो दूसरी लहरों को
उसे वापस लाने के लिए
उसके पीछे दौड़ा दिया

7 comments:

AlbelaKhatri.com ने कहा…

waah waah
kya baat hai !

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

क्या बात है कही बात न लीक हो जाए . भाई आनंद आ गया . बधाई .

vandana ने कहा…

waah kya khoob likha hai......bahut badhiya aur gahri soch

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया.

Babli ने कहा…

अब तो मैं आपकी दसवी फोल्लोवेर बन गई और आपके ब्लॉग पर आती जाती रहूंगी!
बहुत खूब! एक से बढकर एक है आपकी कविता!

Harkirat Haqeer ने कहा…

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति .....बहुत खूब.......!!

स्वप्न मंजूषा शैल ने कहा…

wahhhh
bahut khoob likha aapne, anand aa gaya bas....

सैकडो दूसरी लहरों कोउसे वापस लाने के लिए उसके पीछे दौड़ा दिया

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