सोमवार, 19 जुलाई 2010

छोटे-मोटे हादसे तो होते ही रहते हैं ~~ (वनांचल एक्सप्रेस)

आज दो बजे रात 'वनांचल एक्सप्रेस' के हादसे पर उपजे सवाल और सर्वसुलभ जवाब जो उपलब्ध हो रहे हैं या होंगे. एक लाईना जवाब यही होता है कि 'जाँच के आदेश दे दिये गये हैं" पर क्या मृतक के परिवार के लोगों के दिलों की भी जाँच होगी जिसमें स्थाई रूप से दु:ख और दर्द ने घर कर लिया है?

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लगता है रेल के बड़े अधिकारी

लाईन (हाट लाईन, रेल लाईन नहीं) पर है

चलो उनसे ही पूछते हैं कि ...

जी नमस्कार!

हम जानना चाहते हैं कि

यह हादसा क्यों और कैसे हुआ?

“देखिये इतना बड़ा नेटवर्क है

छोटे-मोटे हादसे तो होते ही रहते हैं

कैसे का जवाब मैं क्या दूँ

मेरे मातहतों ने बताया है कि

दूसरे रेलगाड़ी ने पीछे से टक्कर मारी है

असलियत का पता तो तब चलता

जब टक्कर आगे से मारी गई होती”

टक्कर के बाद राहत कार्य

समय पर क्यों नहीं शुरू किया गया?

‘आप तो बस पीछे पड़ गये हैं

अरे! टक्कर रात के दो बजे हुई है

उस समय तो सारे अधिकारी सो रहे थे

नींद खुलते ही राहत भेज दी गई है

मुझे ही देखिये

कितना सुन्दर सपना आ रहा था

मुझे भी आप लोगों ने जगा दिया”

जी हादसे में कितने लोग मरे हैं?

”केवल सत्तर लोग”

पर सत्तर लोग तो ‘केवल’ नहीं होते

“आपका गणित लगता है कमजोर है

अरे! ट्रेन में तकरीबन दो हज़ार थे

और मरे सत्तर

ये केवल नहीं तो और क्या हैं?”

कौन दोषी हैं?

”यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा

पर लगता यही है कि

यात्री ही दोषी थे

क्योंकि वे सबसे पिछले डिब्बे में क्यों थे;

या फिर आज यात्रा पर ही क्यों थे

घर से गर ये न निकलते तो

अच्छे भले सो रहे होते

इनके अज़ीज तो आज

इस कदर न रो रहे होते”

हलो सर एक और सवाल ...

हलो आप सुन पा रहे हैं या नही? ..

लगता है हमारा सम्पर्क टूट गया ..

देखते रहिये .....

16 comments:

Udan Tashtari ने कहा…

क्या कहा जाये हादसों का! दुखद रहा!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

स्वप्न के माध्यम से सच्चाई को
बहुत ही करीने से पेश किया है आपने!

honesty project democracy ने कहा…

इस देश की पूरी सरकार व सरकारी व्यवस्था सो रही है सारे निकम्मे सरकारी नौकरी में ही रिश्वत देकर भर्ती हो गए हैं ,जो जिन्दा व कामचोर नहीं हैं उनको पूरी तरह बिना काम के कर दिया गया है | इस देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति को शायद तब कुछ एहसास होगा जब एक बड़ा सा हादसा इस देश को ले डूबेगा | अभी तो इनके नाक के नीचे खुले आम सरकारी खजाने को लूटा जाता है कोई भी जिम्मेवारी से काम नहीं करता ,कोई भी सूचना न तो इन्टरनेट पर न ही किसी अन्य जगह पर आम लोगों के लिए मौजूद है ,जिससे आमलोग कुछ निगरानी करते और छोटे मोटे हादसों को भी रोका जा सकता था | लेकिन इस देश की सरकार में बैठे लोगों को हर हादसे में भी भ्रष्टाचार के जरिये गवन का जरिया मिलता है तो ऐसे हादसे रुकेंगे नहीं बल्कि बढ़ने वाले हैं | मुर्दों की सरकार है इस देश में ...!

Coral ने कहा…

एक दुखद घटना पर मार्मिक रचना ... गलती हमेशा जनता की ही होती है ....

वन्दना ने कहा…

बस यही कहकर तो कन्नी काट जाते हैं………………इतना बडा हादसा इसीलिये छोटा लग रहा है क्यूँकि इसमे कोई उनका अपना नही होता अगर होता तो देश का सबसे बडा हादसा ना कहलाया जाता…………सिर्फ़ आम जनता ही सोच सकती है और दुखी हो सकती है बाकी किसी से उम्मीद नही करनी चाहिये।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' ने कहा…

har hadse ki yahi kahani hai ... har bar hadsa hota hai jaanch ke aadesh hote hain ..jaanch ka result kya aaya kya nahi ....bas jaanch chalti rehti hai ..

mridula pradhan ने कहा…

sachchi aur marmik.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यह रचना कैसे छूट गयी पढने से.? आज आपके ब्लोग्स खंगाल रही हूँ तो देखा....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति एक कटु सत्य का बोध कराती हुई

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

भारत हादसों का देश बन गया है अब तो....

शरद कोकास ने कहा…

बढ़िया सटायर है ।

स्वाति ने कहा…

मार्मिक रचना ...

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

हादसे तो दुखद हैं हीं पर उस पर ये जले पर नमक !!!!

Vivek VK Jain ने कहा…

marmik chitran

संजय भास्कर ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

सुज्ञ ने कहा…

माणिक जी,
बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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