मंगलवार, 4 अगस्त 2026

बिना हस्ताक्षर की वसीयत

उसने
एक लिफ़ाफ़ा
थमाया था मुझे।

कहा
"इसमें
मेरे दिल की वसीयत है,
जो तुम्हारे नाम है।"

मैंने भी
बड़ी नफ़ासत से
उसे
सहेजकर रख लिया।

और कुछ दिनो बाद
जब खोला
वह लिफ़ाफ़ा,

और
वसीयत की शर्तों के अनुसार
उसके दिल को
अपनाना चाहा,

तो देखा

वसीयत तो थी,

लेकिन

उस पर
उसके
हस्ताक्षर ही नहीं थे।

शायद
हस्ताक्षर करते समय
कलम की निब नहीं,

वक़्त की
मजबूरियों ने
इरादा
तोड़ दिया होगा।

और

दो दिलों के बीच
एक पुल
बनते-बनते
रह गया।

6 टिप्‍पणियां:

Meena Bhardwaj ने कहा…

मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति ।

M VERMA ने कहा…

जी शुक्रिया

MANOJ KAYAL ने कहा…

बेहतरीन

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

Razia Kazmi ने कहा…

ओह नहीं
बहुत सुंदर

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया