सोमवार, 24 अगस्त 2026

ख़ामोश संवाद

 

उस दिन
जब तल्लीन थे
ज़मीन पर गिरे सूखे पत्ते
अनुवादित करने में
तुम्हारे कंपकंपाते अधरों
के अनबोले बोलों को,

हवा के भी
कान खड़े हो गए थे
सुनने को

याद है?

वृक्ष भी
थोड़ा झुक गया था,
शायद
वह भी जानना चाहता था
तुम्हारे मौन में
छिपे उस प्रेम का
अर्थ।

और मैं
तुम्हारे अधरों की
उस कंपकंपी को
अपनी धड़कनों में
सहेज रहा था।

क्या गौर किया था तुमने

बेंच पर मेरी उंगलिया

तुम्हारी उंगलियो से

बिना स्पर्श के भी

कंपकपाते हुए

कुछ अनकहा कह रही थी 

 

उस दिनजुबान से
कुछ भी तो नहीं कहा था हमने,
फिर भी
न जाने क्यों
आज तक
वह ख़ामोशी
बोलती है।

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