शुक्रवार, 10 जुलाई 2026

ज़द से बाहर

 

तुम्हारी सोहबत का ही असर था,
कि मैं लड़खड़ा रहा था।

मेरी इसी लड़खड़ाहट को देखकर
ट्रैफिक पुलिस ने मुझे रोक लिया।

मुँह से लगाया ब्रेथलाइज़र,
वह हैरान था
अल्कोहल का स्तर
शून्य था।

मैं मुस्कुरा दिया...

नशे में तो था मैं,
मगर उस नशे में
जो किसी मशीन की ज़द में नहीं आता।

उसे नशा मत कहिए साहिब,
अहले-दिल जानते हैं
उसे तो सुरूर कहते हैं।

14 टिप्‍पणियां:

Digvijay Agrawal ने कहा…

 आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में  11 जुलाई, 2026 को लिंक की जाएगी ....  http://halchalwith5links.blogspot.in  पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

जितेन्द्र माथुर ने कहा…

जी हाँ, उसे सुरूर ही कहते हैं

M VERMA ने कहा…

😃

Onkar ने कहा…

सुंदर

हरीश कुमार ने कहा…

बहुत सुंदर रचना

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया

Aman Peace ने कहा…

Wahh!

M VERMA ने कहा…

Thanks 😊

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वह क्या बात है ... उनका सुरूर क्या कहने ....

M VERMA ने कहा…

शुक्रिया