उसने
एक लिफ़ाफ़ा
थमाया था मुझे।
कहा—
"इसमें
मेरे दिल की वसीयत है,
जो तुम्हारे नाम है।"
मैंने
भी
बड़ी नफ़ासत से
उसे
सहेजकर रख लिया।
और
कुछ दिनो बाद
जब खोला
वह लिफ़ाफ़ा,
और
वसीयत की शर्तों के अनुसार
उसके दिल को
अपनाना चाहा,
तो देखा—
वसीयत तो थी,
लेकिन
उस पर
उसके
हस्ताक्षर ही नहीं थे।
शायद
हस्ताक्षर करते समय
कलम की निब नहीं,
वक़्त
की
मजबूरियों ने
इरादा
तोड़ दिया होगा।
और
दो दिलों के बीच
एक पुल
बनते-बनते
रह गया।

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