उसने
एक लिफ़ाफ़ा
थमाया था मुझे।
कहा—
"इसमें
मेरे दिल की वसीयत है,
जो तुम्हारे नाम है।"
मैंने भी
बड़ी नफ़ासत से
उसे
सहेजकर रख लिया।
और कुछ दिनो बाद
जब खोला
वह लिफ़ाफ़ा,
और
वसीयत की शर्तों के अनुसार
उसके दिल को
अपनाना चाहा,
तो देखा—
वसीयत तो थी,
लेकिन
उस पर
उसके
हस्ताक्षर ही नहीं थे।
शायद
हस्ताक्षर करते समय
कलम की निब नहीं,
वक़्त की
मजबूरियों ने
इरादा
तोड़ दिया होगा।
और
दो दिलों के बीच
एक पुल
बनते-बनते
रह गया।

12 टिप्पणियां:
मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति ।
जी शुक्रिया
बेहतरीन
Thanks 😊
ओह नहीं
बहुत सुंदर
शुक्रिया
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में शनिवार 08 अगस्त, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
सादर
शुक्रिया
दिल तो दिल है, अपना या किसी और का, जब अपने दिल को अपना लिया दिल से तो बात बन गई
दिल से दिल का रास्ता कठिन है
सुन्दर
शुक्रिया
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