शुक्रवार, 15 मई 2009

फिर किसी आरुषि को ---- (मौत के एक वर्ष बाद)

जब तुम
खुशियों के गीत गा रहे थे
जब तुम
तारे जमीं पर ला रहे थे
कोई हमारे जेहन में
अनगिनत प्रश्न बो गया
हम सब के देखते-देखते
जमीं का एक तारा
असमान में खो गया

क्या तुम उस तारे को
फिर से जमीं पर ला सकते हो?
क्या तुम फिर उसे
अपने बीच पा सकते हो?
क्या तुम अब भी
खुशियों के गीत गा सकते हो?
क्या तुम उतनी ही सहजता से
रिश्ता निभा सकते हो?

रिश्तों के इर्द-गिर्द
प्रश्न खड़े हैं
छुद्र अनुत्तरित प्रश्न आज भी
हमारे कद से बड़े हैं

धरा को बेशक संवारे
लाकर आसमान के तारे
पर फिर किसी आरुषि को
कोई नरपिशाच तो न मारे.

1 comments:

'अदा' ने कहा…

verma ji,
jin dino yah kand hua tha main bharat main hi thi is liye is ghantna ke saath khud ko ba-khubi jod paayi hun..
darasal main itni vichlit ho gayi thi ki main Noida arushi ke ghar bhi chali gayi thi...jahan jahir hai police aur media ka bahut bada jamawada tha...
lekin aapki is kavita ne fir se yaad taaza kar diya...
amanushikta se manavta kab jeet paayegi yahi dekhna hai...

रिश्तों के इर्द-गिर्द
प्रश्न खड़े हैं
छुद्र अनुत्तरित प्रश्न आज भी
हमारे कद से बड़े हैं
rishton ki or ingit karti hain ye panktiyan..
bahut hi sateek aur sarthak..
dhanyawaad..

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