मंगलवार, 19 मई 2009

और सूरज डूब गया ......


परम मित्र ऋषि प्रकाश के असामयिक निधन पर

तुम ऋषि थे

तुम प्रकाश थे

कभी धरती तो

कभी आकाश थे

नहीं मानी तुमने कभी हार

मनुजता से था तुम्हे प्यार

कभी बल थे

तो कभी संबल थे

इतने निर्मल

जैसे तुम जल थे

जिजीविषा जिसका पर्याय था

जीवन जिसका एक अध्याय था

तुम तो तुम थे

किसी के माथे की

कुमकुम थे

हमें क्या पता था कि

जीवन जिंदा रहने से

ऊब गया था

सोलह मार्च की वह काली सुबह

जब सूरज उगने की बजाय

डूब गया था

तुम्हे तो जाना था

तुम चले गए

तुम्हारे अज़ीज़ किस कदर

छले गए

रिश्तों को तुमने एक

आयाम दिया

भाईचारे का निरंतर

पैगाम दिया

तुम तो थे

सबके भाई

तुम्हारे रूठने की

यह अदा हमें तो

रास न आई

हमें क्या पता था कि

तुम पलाश थे

तुम ऋषि थे

तुम प्रकाश थे

कभी धरती तो

कभी आकाश थे

4 comments:

abhishek ने कहा…

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M VERMA ने कहा…

धन्यवाद इतने सुन्दर टिप्पणी के लिये

Ekta ने कहा…

Such a touching poem i hav ever heard.
Nobody can stop showing his/her emotions after reading this poem.
Everything u hav written in this poem is the true fact of Rathi Uncle's life.
We all miss him n will always miss him.

बेनामी ने कहा…

We all miss him n will always miss him.

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