रविवार, 28 जून 2009

परिभाषाओं की बही -----


कुछ भी करिए
सब सही है
देखते नहीं मेरे हाथ में
परिभाषाओं की बही है!
मेरे अपने जब करते हैं तो
बलात्कार को भी मैं
'स्वीकार' लिखता हूँ
किसी और के लिए तो
गुफ्तगू को भी मैं
'अनाचार' लिखता हूँ
सच के खिलाफ पल में
झूठ की गवाही दिला देता हूँ
जानता हूँ इस तथ्य को कि
सच के पक्ष में
कोई सच खड़ा नहीं होगा
आदमकद झूठ के कद से
सच का कद बड़ा नहीं होगा
तुम बेफिक्र रहो
मेरी जिरह से तो
सच 'सच' को भी पहचानने से
मना कर देगा
हैवानियत पल में
इंसानियत को
फ़ना कर देगा
कुछ इस तरह मैं
जीवन का सार लिखूंगा
जरूरत पड़ने पर कलम को
संहारक हथियार लिखूंगा
बेखौफ रहिए
सब सही है
जब तक मेरे हाथ में
परिभाषाओं की बही है -----

13 comments:

USHA GAUR ने कहा…

बेखौफ रहिए सब सही है
जब तक मेरे हाथ में
परिभाषाओं की बही है -----
करारा व्यंग्य किया है आपने
बहुत प्रभावशाली रचना

Razia ने कहा…

बहुत खूब
करारा प्रहार है

ओम आर्य ने कहा…

बहुत सुन्दर विचार मंथन.......

sandhyagupta ने कहा…

Sarthak lekhan.Badhai.

विवेक सिंह ने कहा…

खदेड़ दिया दुश्मनों को !

विवेक सिंह ने कहा…

खदेड़ दिया दुश्मनों को !

VaRtIkA ने कहा…

"मेरे अपने जब करते हैं तो बलात्कार को भी मैं 'स्वीकार' लिखता हूँ किसी और के लिए तो गुफ्तगू को भी मैं 'अनाचार' लिखता हूँ"

bahut sa-shakt... humesha ki tarah........

अनिल कान्त : ने कहा…

बहुत बेहतरीन लिखा है आपने ...आपकी कलम बोलती है

SWAPN ने कहा…

prabhavshali rachna ke liye badhai sweekaren, vermaji.

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया व जोरदार लिखा है।बधाई।

chhotigali ने कहा…

माशा अल्ला, जवाब नहीं। पढ़कर दिल बेचैन हो गया...पता नहीं क्यों..पर लगता है मेरे भी दिल की बात बयां हो गई....यह कविता सही में सोचने पर मज़बूर कर गई.....

ARUNA ने कहा…

bahut khoob verma ji!!!!sundar lekhan!!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

Shabdon aur vichaaron ka khoobsoorat taartamy baithaya hai aapne......Vyang ki tez dhaar hai yeh rachnaa....... lajawaab

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