सोमवार, 21 सितंबर 2009

किसी के मरने की खबर नहीं है ~~

~~~
गगन चूमने को आतुर था
यह अधबना मकान
सहसा धराशायी हो गया
आश्रय देने को आतुर था
पलांश मे आततायी हो गया
हम भी तो आदी हैं
ढहन देखने को
हर बार हम बनाते हैं
एक नई लंका
लंकादहन देखने को
हमारी आँखें तलाशती हैं
बिखरी हुई रक्ताभ ईटें
मांस के लोथड़े और रक्त की छीटें
आज के इस हादसे में
किसी के मरने की खबर नहीं है
बेशक ईंटों के बीच दबी हैं
कुछ सस्ती चूनर;
कुछ सिसकियाँ
कुछ मासूमों की चीखें
पर इनमें खून का
कोई निशान नहीं हैं
यकीनन इस हादसे में
कोई जान नहीं है
*
शायद वे खून को
पहले ही चट कर चुके हैं
शायद वे इस सीन को
पहले ही कट कर चुके हैं

14 comments:

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

Bhavpurn rachana..aaj ke halat par purtah fit jo kabhi bhi ghat jati hai badi badi imaraton ke sath se nikalane wali badhiya bhav se sampan kavita..badhayi..

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

बहुत सुन्दर , क्या करे य्ही कटु सच है, वर्मा साहब !

मीनू खरे ने कहा…

कटु सच का सामना.

KNKAYASTHA "नीरज" ने कहा…

शायद वे खून को
पहले ही चट कर चुके हैं
शायद वे इस सीन को
पहले ही कट कर चुके हैं


वाह...वाह...वाह...

अनुपस्थित रहने को क्षमा करें...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

ढहन देखने को
हर बार हम बनाते हैं
एक नई लंका
लंकादहन देखने को
हमारी आँखें तलाशती हैं

बेहद खूबसूरत रचना है।
नवरात्रों की शुभकामनाएँ!
ईद मुबारक!!

विवेक ने कहा…

यकीनन इस हादसे में कोई जान नहीं है...बहुत जानदार लाइंस हैं...वाकई इन हादसों का खून तो पहले ही चट किया जा चुका है...बची हैं हड्डियां जिन्हें ठेकेदारी कुत्तों के आगे डाल दिया जाएगा...

बहुत अच्छी कविता।

mukesh ने कहा…

सच मुच बहुत ही शानदार प्रस्तुति ! बधाई

VaRtIkA ने कहा…

bahut acchi rachna hai sir .... accha kataksh kiyaa gaya hai.... par afsos ki aaj ki sthiti yahi ho chali hai...jab tak koi mare nahin, tab tak ghatnaa ko ghatnaa nahin maana jaata...aam aadmi, mazdoor...yeh sab aadmi ki tarah thode hi dekhe jaate hain, ki jinke dabne, ghayal hone ko khabar maana jaaye...

"बेशक ईंटों के बीच दबी हैं
कुछ सस्ती चूनर;
कुछ सिसकियाँ
कुछ मासूमों की चीखें
पर इनमें खून का
कोई निशान नहीं हैं
यकीनन इस हादसे में
कोई जान नहीं है"

aur media bhi aisi khabron ko cover karte samay praya yahi dikhaati hai ki X buisnessman ne itne crore rupaye ganvaa diye kyunki uski yeh building gir gayi.... kitne mazdooron ne jaan gavaa di... unhein kitni kshati hui, yeh sab to pehle hi editing table pe cut ho chukaa hota hai...

vartamaan samaj ki iss sharmnaak sacchai ko apni rachnaa mein swar dene ke liye aapkaa aabhar sir...

Udan Tashtari ने कहा…

बेहद कड़वा सच-भावपूर्ण सटीक रचना.

वाणी गीत ने कहा…

आज के इस हादसे में
किसी के मरने की खबर नहीं है
यकीनन इस हादसे में
कोई जान नहीं है
शायद वे खून को
पहले ही चट कर चुके हैं
इतनी खूबी से कटु यथार्थ को प्रस्तुत करने का आभार ..!

वन्दना ने कहा…

behad marmik aur satya se ot-prot rachna.dil ko gahre tak choo gayi.
pls visit my new blog also:
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Babli ने कहा…

अत्यन्त सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! सच्चाई को आपने बखूबी प्रस्तुत किया है! बहुत बढ़िया लगा ! नवरात्री की हार्दिक शुभकामनायें!

महफूज़ अली ने कहा…

कुछ सिसकियाँ
कुछ मासूमों की चीखें
पर इनमें खून का
कोई निशान नहीं हैं
यकीनन इस हादसे में
कोई जान नहीं है....

bahut hi vyatha bhari lines ....... in lines ne andar tak hila diya....


"किसी के मरने की खबर नहीं है ~~"

waaqai mein kisi ke marne ki khabar nahi hai.......

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

एक कटु सत्य को बयान कर दिया आपने। बहुत बेहतरीन लिखा है।

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