शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

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निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम



अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम


साक्षात मगर हो


दिवा-सपन सी


साहचर्य तुम्हारा


पूस-कपन सी


लजायमान स्पर्श-कामना को स्पर्श-बोध चाहिये


कल-कल-निनाद साधों को ना अवरोध चाहिये


बाधित आतुरता के कोमल भाव सहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


भ्रमर गुंजन सी


श्वासों की लहरी


सम्पूर्ण कायनात


शायद है ठहरी


अनकहे सन्देशों ने जब सब कुछ कह डाला है


फिर क्यूँ इन मृद अधरों पर चुप्पी का ताला है


सागर-मिलन को आतुर लहरों सी बहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


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12 comments:

Archana ने कहा…

आपकी छोटी रचनाएं हमेशा प्राभावित करती रही है ..पढ़ती रही हूँ आपको ...आज पहली बार सुना...बहुत सुकुन भरा विनय लगा साथ मे लगा चित्र लग रहा था अब तो बोलना ही होगा.....आभार...

Razia ने कहा…

सुन्दर शब्द संयोजन और भाव सम्प्रेषण.

बहुत आकर्षक

वाणी गीत ने कहा…

आपकी आम कविताओं से अलग हट कर है ...
मधुर !

Arvind Mishra ने कहा…

आप तो आज बनारस पहुँचने वाले हैं न
फिर तो मिलकर इस कविता पर चर्चा हो जाय !

AMAN ने कहा…

बहुत सुन्दर

AlbelaKhatri.com ने कहा…

aanand aa gaya .....waah !

uttam kaavya

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

अनकहे सन्देशों ने जब सब कुछ कह डाला है

फिर क्यूँ इन मृद अधरों पर चुप्पी का ताला है

सागर-मिलन को आतुर लहरों सी बहो आज तुम


बहुत सुन्दर शब्दों में मन के भावों को कहा है ..सुन्दर अभिव्यक्ति

वन्दना ने कहा…

कोमल भावों की सुन्दर अभिव्यक्ति।

Kailash C Sharma ने कहा…

बहुत भावपूर्ण और संवेदनशील प्रस्तुति ..आभार

Sadhana Vaid ने कहा…

बहुत कोमल एवं भावपूर्ण रचना है ! इसे पढ़ कर आनंद आ गया ! अति सुन्दर !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम
अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम
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रचना पढ़-सुनकर आनन्द आ गया!

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रेमाभिव्यक्ति। बधाई।

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