प्रवाह

निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....

पहचान – The identity

खुद की पहचान के लिये

उनसे पहचान बनाते-बनाते

मैनें उन्हें पहचान लिया,

और फिर -

पहचान बनते-बनते रह गई.

..

कई बार उन्होनें

पुरजोर कोशिश की

मुझसे पहचान बनाने की,

पर जैसे ही

मुझे पहचाना

पहचान बनते-बनते रह गई.

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21 comments:

चलो अच्छा हुआ समय रहते पहचान हो गयी।
वरना असलियत समझने में उम्र गुजर जाती है।

राम राम वर्मा जी।
बड़े दिनों से ढूंढते-ढूंढते आज मुलाकात हूई।
शुभकामनाएं।
आभार

 

वर्मा जी सही बात ,हम किसी को जानते पहले हैं फिर पहचानते है धीरज रखिये

 

alag andaaz hain aapke !manmohak hain lekhan ke saaz ,bhi arth bhi .
veerubhai

 

पहचानते हुए औरों को कई बार अपनी पहचान खो जाती है ...अपनी पहचान बचाए या दूसरों को पहचाने ..!

 

मैनें उन्हें पहचान लिया,

और फिर -

पहचान बनते-बनते रह गई... aur phir ek nai shuruaat

 

वाह वर्मा जी, देखिये इसी पहचान के बहाने अपन की भी पुरानी पहचान निकल आयी.....

कम शब्दों में बेतरीन कविता.

 

वाह वर्मा जी, देखिये इसी पहचान के बहाने अपन की भी पुरानी पहचान निकल आयी.....

कम शब्दों में बेतरीन कविता.

 

वाह वर्मा जी, देखिये इसी पहचान के बहाने अपन की भी पुरानी पहचान निकल आयी.....

कम शब्दों में बेतरीन कविता.

 

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (28-4-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

 

खुद की पहचान के लिये

उनसे पहचान बनाते-बनाते

मैनें उन्हें पहचान लिया,

और फिर -

पहचान बनते-बनते रह गई.
सुंदर अभिव्यक्ति। बहोत दिनो बाद आपके ब्लोग पर आना हुआ। माफ़ी चाहते हैं।

 

खुद की पहचान के लिये

उनसे पहचान बनाते-बनाते

मैनें उन्हें पहचान लिया,

और फिर -

पहचान बनते-बनते रह गई.

..

कुछ शब्दों में इतना गहन दर्शन..बहुत प्रभावमयी प्रस्तुति..

 

कम शब्दों में बेतरीन कविता|धन्यवाद|

 

जानने पहचानने की डगर है ही बड़ी टेढ़ी मेढ़ी और लंबी । बहुत ही अच्छी लगी आपकी रचना । धन्यवाद एवं शुभकामनायें ।

 

लोग भले ही दावा कर लें की हम किसी को पहचान गए हैं ..पर इंसान कभी कभी स्वयं को भी नहीं पहचान पाता ...यूँ ही कभी कभी पहचान बन जाती है और कभी बनते बनते रह जाती है .. सुन्दर प्रस्तुति ..

 

पर जैसे ही
मुझे पहचाना
पहचान बनते-बनते रह गई....
bahut khoob ... darasal asli chehra jab saamne aa jata hai to pahchaan hote hote rah jaati hai ... kamaal ka likha hai Varma ji ...

 

ham aaj bhi apni pahchan talas rahe hai... bhut khubsurat rachna...

 

पहचान का संकट क्यूं ?