रविवार, 29 अप्रैल 2012

कथोपकथन हो गया …..

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नजर मिली

नजर झुकी

कथोपकथन हो गया

मन बावरा

न जाने किन ख्वाबों में

खो गया

.

‘पत्थर’ ने

पत्थर मारा

चोट लगी

‘पत्थर’ को

पत्थरमय फिर

आसमान हो गया

‘पत्थर’ भी भागे

घर को

.

जुल्म को कभी

सह मत

गलत से

न हो कभी

सहमत

.

 

10 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

सुंदर रचनाएँ .... सहमत

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह!

रश्मि प्रभा... ने कहा…

जुल्म को कभी

सह मत

गलत से

न हो कभी

सहमत

... सहमत हूँ इस विचार से

Sunil Kumar ने कहा…

कुछ अलग सी पोस्ट सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी

मनोज कुमार ने कहा…

कविता में शब्दों के प्रयोग अद्भुत हैं।

वाणी गीत ने कहा…

गलत से कभी ना हो सहमत !
सहमत !
अच्छी लगी शब्दों की हेराफेरी !

Pallavi ने कहा…

आपकी इस कविता में शब्दों का प्रयोग बहुत प्रभावशाली है। सुंदर एवं सार्थक रचना समय इले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

mridula pradhan ने कहा…

नजर मिली

नजर झुकी

कथोपकथन हो गया bahut sunder pangti.....

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

main bhee aapse purntaya sahmat hoon..pahli baar aapke blog par aana hu,,,accha laga,,,sader badhayee kesath

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

कथोपकथन की बहुत बढ़िया परिभाषा!
--
आज चार दिनों बाद नेट पर आना हुआ है। अतः केवल उऊपस्थिति ही दर्ज करा रहा हूँ!

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