महामना के सपनों का काशी हिन्दु विश्वविद्यालय का कैम्पस सुव्यवस्थित ढंग से लगभग 5.5 किमी के दायरे में फैला हुआ है. कई मायने में यह मेरे लिये अत्यंत अविष्मरणीय पलों का साक्षी रहा है. विश्वविद्यालयी शिक्षा यहीं सम्पन्न हुई. बी.ए., एम. ए. और फिर बी.एड. यानि लगभग 5-6 वर्ष इसी कैम्पस में व इसके इर्द-गिर्द व्यतीत हुआ है. यहीं जीवन साथी की तलाश भी पूरी हुई. काफी अर्से बाद फिर से एक बार इस कैम्पस में पहुँचने का अवसर मिला. सुखद लगा उन स्थानों को दुबारा देखना. कुछ कैमरा कहेगा और कुछ मैं. आप भी देखे सुने.
'मधुबन' यादों का वह पड़ाव जहाँ की मिट्टी में आज भी वही खुशबू है. न जाने कितने नुक्कड़ नाटकों का रिहर्सल यहाँ सम्पन्न किया गया और फिर काफी की चुस्की ....
मधुबन में ही ललित कला के छात्रो की कृतियाँ तब से अब तक यूँ ही .....
एक और नायाब कृति : मधुबन में ही.
विश्वविद्यालय परिसर में विश्वनाथ मन्दिर जिसकी भव्यता में कोई परिवर्तन नहीं
फुर्सत के पल : मैत्री जलपान गृह में जलपान हो जाये.
हिन्दी विभाग : जहाँ न जाने कितने मूर्धन्य हिन्दी विद्वानों का सानिध्य प्राप्त हुआ. यहाँ खड़े होते ही 'स्वर्गीय बब्बन त्रिपाठी जी' के शब्द कानों में गूँजने लगे, जिनके 'निराला' पर व्याख्यान आसपास के संकायों के छात्रों को भी अपनी ओर खीच लाते थे और कक्षाकक्ष खचाखच भर जाता था. जहाँ के विभागाध्यक्ष प्रो. शिवप्रसाद सिंह हुआ करते थे.
और फिर मेरा हास्टल 'बिरला हास्टल'
मालवीय स्मृति भवन : यहाँ नहीं गये तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय क्या देखा !!
मालवीय स्मृति भवन का मुख्य भवन
मालवीय स्मृति भवन का पार्क जहाँ मैं नहीं ह + म = हम बैठा करते थे. वह पेड़ आज भी यथारूप अपने चबूतरे के साथ (तीर के निशान से इंगित है) शायद प्रतीक्षारत है .. पर यह क्या ... अब तो इसमें प्रवेश निषेध है.
