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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

लौटना फिर कभी ... (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)

File:BHU Entrance.JPG

महामना के सपनों का काशी हिन्दु विश्वविद्यालय का कैम्पस  सुव्यवस्थित ढंग से लगभग 5.5 किमी के दायरे में फैला हुआ है. कई मायने में यह मेरे लिये अत्यंत अविष्मरणीय पलों का साक्षी रहा है. विश्वविद्यालयी शिक्षा यहीं सम्पन्न हुई. बी.ए., एम. ए. और फिर बी.एड. यानि लगभग 5-6 वर्ष इसी कैम्पस में व इसके इर्द-गिर्द व्यतीत हुआ है. यहीं जीवन साथी की तलाश भी पूरी हुई. काफी अर्से बाद फिर से एक बार इस कैम्पस में पहुँचने का अवसर मिला.  सुखद लगा उन स्थानों को दुबारा देखना.  कुछ कैमरा कहेगा और कुछ मैं. आप भी देखे सुने.


'मधुबन' यादों का वह पड़ाव जहाँ की मिट्टी में आज भी वही खुशबू है. न जाने कितने नुक्कड़ नाटकों का रिहर्सल यहाँ सम्पन्न किया गया और फिर काफी की चुस्की ....

 


मधुबन में ही ललित कला के छात्रो की कृतियाँ तब से अब तक यूँ ही .....


एक और नायाब कृति : मधुबन में ही.


विश्वविद्यालय परिसर में विश्वनाथ मन्दिर जिसकी भव्यता में कोई परिवर्तन नहीं

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फुर्सत के पल : मैत्री जलपान गृह में जलपान हो जाये.

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हिन्दी विभाग : जहाँ न जाने कितने मूर्धन्य हिन्दी विद्वानों का सानिध्य प्राप्त हुआ. यहाँ खड़े होते ही 'स्वर्गीय बब्बन त्रिपाठी जी' के शब्द कानों में गूँजने लगे, जिनके 'निराला' पर व्याख्यान आसपास के संकायों के छात्रों को भी अपनी ओर खीच लाते थे और कक्षाकक्ष खचाखच भर जाता था.  जहाँ के विभागाध्यक्ष प्रो. शिवप्रसाद सिंह हुआ करते थे.

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 और फिर मेरा हास्टल 'बिरला हास्टल'


 मालवीय स्मृति भवन : यहाँ नहीं गये तो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय क्या देखा !!


 मालवीय स्मृति भवन का मुख्य भवन


मालवीय स्मृति भवन का पार्क जहाँ मैं नहीं ह + म = हम बैठा करते थे. वह पेड़ आज भी यथारूप अपने चबूतरे के साथ (तीर के निशान से इंगित है) शायद प्रतीक्षारत है .. पर यह क्या ... अब तो इसमें प्रवेश निषेध है.

शनिवार, 26 जून 2010

एक गाँव मर रहा है ....

पिछले दिनों मैं अपने पैतृक नगर वाराणसी गया हुआ था. वाराणसी में मेरा गाँव शहर से सटा हुआ वाराणसी स्टेशन से लगभग 3 किमी की दूरी पर है. हर बार जब भी मैं अपने गाँव से लौटता हूँ तो मन में वितृष्णा और विषाद लेकर लौटना पड़ता है क्योंकि एक सलोने और सुन्दर गाँव को मरते देखने जैसी अनुभूति पैदा होती है. शहर के नज़दीक होने के कारण और जनसंख्या के दबाव के कारण फसल उगाते गाँव को अपना स्वरूप बदलना पड़ रहा है. ईटों और कंक्रीटों का आक्रमण मासूम खेतों को झेलना पड़ रहा है और बने अधबने मकानों का एक जंगल खड़ा होता जा रहा है. और फिर संस्कृति के अपमिश्रण से अजीब सी तमाम विसंगतियों से युक्त संस्कृति का जन्म होता जा रहा है. कहीं कहीं फसलों की हरियाली भी नज़र आती है पर निकट भविष्य में ही ये भूतकाल के दृश्य होने जा रहे हैं अपने घर के छत से एक विहंगम दृश्य लिया है आप भा अवलोकन करें :

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उफ ! लगता है अब तक मैनें अपने गाँव का नाम नहीं बताया है. मेरे गाँव का नाम फुलवरिया है. यह लहरतारा (कबीर दास जी वाले) के पास स्थित है. इसके पूर्व में '39 गोरखा ट्रेनिंग सेंटर' है तो पश्चिम में 'वरूणा नदी' बहती है. कुछ दृश्य वरूणा नदी का भी :

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यह वही वरूणा नदी है जिसके नाम को समाहित करते हुए शहर का नाम 'वाराणसी' पड़ा है. वरूणा + अस्सी = वाराणसी (अस्सी गंगा नदी का सुप्रसिद्ध घाट)

आम नदियों सा इस नदी का भी हश्र हो रहा है देखे :

प्रदूषण का ज़हर इसे भी निगलने जा रहा है.

अब मेरे गाँव का सूरज कुछ इस तरह निकलता है

 

जी हाँ लंगोट भी खो गया है. फिर मैं पीछे क्यूँ रहूँ, लो जी मैं भी गदा उठा लिया :


और अंत में विषादों को सहेजे इसी समानांतर पथ पर 'गरीब रथ' से वापस आ गया.


अगली पोस्ट : काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के बारे में शीघ्र ही

 

शुक्रवार, 21 मई 2010

हमसफर के साथ सफर .. एक अनुभव

शादी की पचीसवीं वर्षगांठ (20 मई) पर एक अनुभव (संस्मरण) साझा कर रहा हूँ.


----- लोग भी तो आदी हो गये थे तुम्हें और मुझे साथ-साथ देखने को. शुरूआती दिनों में बेशक साथ-साथ होने पर प्रश्न खड़े हुए हों पर समयांतराल के बाद साथ-साथ न होने पर प्रश्न खड़े होते थे. प्रश्न भी अजीब होते हैं ना .. कभी-कभी प्रश्न जिससे होता है उसे छोड़कर सबके सामने उपस्थित हो जाते हैं. ख़ैर .. याद है तुम्हें हम हमेशा साथ-साथ बस में सफर करके यूनिवर्सिटी जाते थे. मैं पहले आ जाता तो तुम्हारा इंतजार करता था. तुम आती जरूर थी. और यदि तुम पहले आ जाती थी तो तुम इंतजार करती थी (पर ऐसा बहुत कम होता था).


और उस दिन ---- इंतजार लम्बा होता गया. आज अनुमान लगाकर देखना उस दिन की उस व्यग्रता को जो मेरे अन्दर रही होगी. तुम नहीं आयी. कंडक्टर भी शायद मुझे अकेला सफर नहीं करवाना चाहता था. पर कब तक .. तुम नहीं आयी और बस को गंतव्य तक जाना ही था. बस स्टार्ट हो गयी और मैं ... मुझे यह स्वीकार नहीं था कि तुम्हारे बिना मैं जाऊँ और एकाएक मैं उतर गया था बस से.


क्यों नहीं आयी! हद है कल बता तो सकती थी कि नहीं जाना है, मैं भी नहीं आता. थक हार कर मैं फिर एक दूसरी बस से यूनिर्सिटी चला गया. अरे! यह क्या तुम तो वहाँ पहले से ही पहुँची हुई थी. पूछने पर तुमने बताया कि तुम उसी बस से आयी थी जिस बस से मैं उतर गया था. हुआ यह कि जिस क्षण मैं बस से उतरा था ठीक उसी क्षण तुम बस में सवार हुई थी. मैं आगे वाले गेट से उतरा और तुम पीछे वाले गेट से बस में प्रवेश की. और फिर बस में बैठे तमाम लोगों (अधिकांश प्रतिदिन के मुसाफिर थे) की अर्थपूर्ण मुस्कराहट को झेलेते हुए तुम आ गयी थी.


पचीस सालों के जिन्दगी के सफर (हमसफर के रूप में) के बाद आज उस सफर को याद करके रोमांचित हूँ मैं ---


और तुम ----


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इन फूलों में रंग नहीं भर पाया. तुम इस अवसर पर मुझसे 800 किमी. दूर जो बैठी हो. तुम्हारे लौटने पर इसमें रंग भी भरूंगा।


आज २५ मई को तुम वापस आ गयी हो तो गुलाब भी रंगीन हो गया