रविवार, 28 नवंबर 2010
तुम शब्द सम्पदा परिपुष्ट मगर ढाई आखर --
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
कायनात का प्रकम्पन ....

शनिवार, 25 सितंबर 2010
बिखरे हुए एहसास ....
शुक्रवार, 21 मई 2010
हमसफर के साथ सफर .. एक अनुभव
शादी की पचीसवीं वर्षगांठ (20 मई) पर एक अनुभव (संस्मरण) साझा कर रहा हूँ.
----- लोग भी तो आदी हो गये थे तुम्हें और मुझे साथ-साथ देखने को. शुरूआती दिनों में बेशक साथ-साथ होने पर प्रश्न खड़े हुए हों पर समयांतराल के बाद साथ-साथ न होने पर प्रश्न खड़े होते थे. प्रश्न भी अजीब होते हैं ना .. कभी-कभी प्रश्न जिससे होता है उसे छोड़कर सबके सामने उपस्थित हो जाते हैं. ख़ैर .. याद है तुम्हें हम हमेशा साथ-साथ बस में सफर करके यूनिवर्सिटी जाते थे. मैं पहले आ जाता तो तुम्हारा इंतजार करता था. तुम आती जरूर थी. और यदि तुम पहले आ जाती थी तो तुम इंतजार करती थी (पर ऐसा बहुत कम होता था).
और उस दिन ---- इंतजार लम्बा होता गया. आज अनुमान लगाकर देखना उस दिन की उस व्यग्रता को जो मेरे अन्दर रही होगी. तुम नहीं आयी. कंडक्टर भी शायद मुझे अकेला सफर नहीं करवाना चाहता था. पर कब तक .. तुम नहीं आयी और बस को गंतव्य तक जाना ही था. बस स्टार्ट हो गयी और मैं ... मुझे यह स्वीकार नहीं था कि तुम्हारे बिना मैं जाऊँ और एकाएक मैं उतर गया था बस से.
क्यों नहीं आयी! हद है कल बता तो सकती थी कि नहीं जाना है, मैं भी नहीं आता. थक हार कर मैं फिर एक दूसरी बस से यूनिर्सिटी चला गया. अरे! यह क्या तुम तो वहाँ पहले से ही पहुँची हुई थी. पूछने पर तुमने बताया कि तुम उसी बस से आयी थी जिस बस से मैं उतर गया था. हुआ यह कि जिस क्षण मैं बस से उतरा था ठीक उसी क्षण तुम बस में सवार हुई थी. मैं आगे वाले गेट से उतरा और तुम पीछे वाले गेट से बस में प्रवेश की. और फिर बस में बैठे तमाम लोगों (अधिकांश प्रतिदिन के मुसाफिर थे) की अर्थपूर्ण मुस्कराहट को झेलेते हुए तुम आ गयी थी.
पचीस सालों के जिन्दगी के सफर (हमसफर के रूप में) के बाद आज उस सफर को याद करके रोमांचित हूँ मैं ---
और तुम ----
इन फूलों में रंग नहीं भर पाया. तुम इस अवसर पर मुझसे 800 किमी. दूर जो बैठी हो. तुम्हारे लौटने पर इसमें रंग भी भरूंगा। 
आज २५ मई को तुम वापस आ गयी हो तो गुलाब भी रंगीन हो गया
रविवार, 9 अगस्त 2009
--- सुरूर छाता है ! ! ( रोटी ने तवे से जो कहा मैंने सुना)

*
रोटी ने तवे से कहा
तुम्हारा अस्तित्व तो
बहुत करामाती है
तुम्हारी आँच मुझको तो
बहुत भाती है
तुम्हारे वजूद ने
मुझको सपन दिया है
सच कहूँ तो
एक मीठी सी तपन दिया है
तवा बोला
पर ये आग मेरा नहीं है
मैं तो महज़ वाहक हूँ
तुम्हारे और चूल्हे के बीच
मैं तो नाहक़ हूँ
चीत्कार कर उठी रोटी --
नहीं -- नहीं !!
मुझे चूल्हे की आग से क्या लेना
उसकी आग तो झुलसाती है
मेरे शफ्फाक़ वज़ूद पर
दाग दे जाती है
वाहक कभी नाहक़ नहीं होता
मुझे तो
तुम्हारी ही आग में सिकना भाता है
तुम्हारे अस्तित्व से लिपटकर
एक सुरूर सा छाता है.
--- सुरूर छाता है
*