शनिवार, 13 जून 2009

ज़मीन को कसकर पकड़े रहना ! ! !


दरख्त !
तुम छू लोगे
आसमान की बुलंदियां एक दिन
बस,
ज़मीन को कसकर पकड़े रहना.
आंधियां आयेंगी
आने दो,
थोड़ा झुककर
इन्हे गुज़र जाने दो
तुम धूप की तपिश में
निखर जाओगे,
नई कोंपले फिर पनपेंगी
रिमझिम फुहार
जब पाओगे,
तुम्हारी छांव में
मुसाफिर फिर सुस्तायेंगे
अपने शाखों को बस
दोनो हांथों से
पकड़े रहना !

11 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

बहुत ही गहरी बात कर दी है आपने ..............सही है उच्चाई पानी है तो जमीन से जुडा होना बहुत जरुरी है.

vandana gupta ने कहा…

bahut gahrayi hai ............bahut shandaar.

vandana gupta ने कहा…

bahut gahrayi hai ............bahut shandaar.

शोभना चौरे ने कहा…

bhut sundar bhavbhivykti.

!!अक्षय-मन!! ने कहा…

dil ko chuti hai aapki ye rachna.....

तुम्हारी छांव में मुसाफिर फिर सुस्तायेंगेअपने शाखों को बसदोने हांथों से पकड़े रहना !
ye pankhtiyaan kamaal ki hain bahut khub...

ye

वर्तिका ने कहा…

बहतु सुंदर... so wise nd true...

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बेहतरीन रचना बधाई.

Urmi ने कहा…

उम्दा रचना के लिए बधाई! लिखते रहिये!

Shilpa Garg ने कहा…

Very beautifully written!

shikha varshney ने कहा…

वाह एकदम पते कि बात सुंदर तरीके से कही है आपने.

शिवनाथ कुमार ने कहा…

सुंदर रचना !
सीख भरी सुंदर सी कविता !!