सोमवार, 3 अगस्त 2009

---- शायद तुम आ जाओ #



उस दिन तय था कि
हम मिलेंगे
इसी दरख्त के नीचे
परिन्दों की चहकन सुनते हुए
बैठा रहा मैं ख्वाब बुनते हुए
समय के भान से परे हो गया था
और -----
----- और तुम नहीं आई
.
आज जबकि तय है कि
तुम नहीं मिलोगी
इस दरख्त के नीचे
तनहा आँखें मीचे
परिन्दों की चहकन सुनते हुए
बैठा रहा हूँ मैं ख्वाब बुनते हुए
समय के भान से परे हूँ मैं
शायद ----
---- शायद तुम आ जाओ
.
आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----

24 comments:

Razia ने कहा…

आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----
बहुत खूबसूरत एहसास --
बहुत सुन्दर रचना
बहुत खूब

श्यामल सुमन ने कहा…

शायद का कोई प्रश्न नहीं आयेंगी वो पास।
भाव शब्द संयोग से रचना बनी है खास।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

‘नज़र’ ने कहा…

अत्यन्त सुन्दर रचना है
---
1. चाँद, बादल और शाम
2. विज्ञान । HASH OUT SCIENCE

ओम आर्य ने कहा…

sahi kaha aapane tay to kuchh bhi mahi hai ......ek gahari anubhooti deti rachana...........bahut badhiya

mehek ने कहा…

आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है
waah bahut hi gehre bhva,dil tak pahunch gaye,sahi hai kuch tay karna bada mushkil.sunder rachana.badhai

Nirmla Kapila ने कहा…

आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है
बहुत खूब सूरत अंदाज़ मे इन्तज़ार और इज़्हार को शब्द दिये हैं लाजवाब शुभकामनायें्

Ekta ने कहा…

VERY GOOD COMPOSITION
WOW!

मीत ने कहा…

बहुत सही है.

विवेक सिंह ने कहा…

आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----


बहुत सही !

RAJNISH PARIHAR ने कहा…

sach me jo tay hotas hai wo hota kahan hai..!!!!

अजय कुमार झा ने कहा…

क्या बात है ..जो तय है ..उसका भी पता नहीं..अद्भुत कल्पना और अद्भुत रचना जी..बहुत सुन्दर ..

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

Sundar Vichar.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

संजीव गौतम ने कहा…

आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----
बहुत सही जगह ले जाकर छोडा है कविता को बहुत कुछ कहकर बहुत कुछ अनकहा वाह्

प्रवीण शुक्ल (प्रार्थी) ने कहा…

नमस्कार वर्मा जी कितनी खूबसूरती से एक बेहतरीन अहसास को शब्द दिए है अद्भुद है , भावो के द्वंद को जिस तरह से आप ने दरसाया है बेहतरीन है भुत ही बेहतरीन दिल को छूने बाली रचना
मेरा प्रणाम स्वीकार करे
सादर
प्रवीण पथिक
9971969084

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बैठा रहा हूँ मैं ख्वाब बुनते हुए
समय के भान से परे हूँ मैं
शायद ----
---- शायद तुम आ जाओ.

शब्द-चित्र बहुत बढ़िया हैं।
बधाई।

Babli ने कहा…

अत्यन्त सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना बहुत अच्छी लगी!

Prem Farrukhabadi ने कहा…

verma ji
yah rachna apke komal premi hraday ka bhan karati hai dil se badhai!

VaRtIkA ने कहा…

"आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----"

itni sehejta se sidh kar keh gaye aap sir ... ek halkaa se dard se nam yeh rchnaa samay ke bandhanon se pare hi hai sir...

Sheena ने कहा…

आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----

Shayad isi ka naam ummeed hai

-Sheena

चंदन कुमार झा ने कहा…

बहुत ही सुन्दर रचना......धीरे धीरे सारी रचनायें पढ़ रहा हूँ. आभार.

अर्शिया अली ने कहा…

Sundar bhaav.
{ Treasurer-T & S }

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

varma ji ,

kya kahun , nishabd hoon ... antim panktiyan to gazab ki likhi hui hai ....badhai ...

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

दिगम्बर नासवा ने कहा…

KHPPBSOORAT EHSAAS HAI...LAJAWAAB LIKHA HAI... VAISE TO AGAR KOI CHAAHAT HO TO AISAA HI HOTA HAI...

रज़िया "राज़" ने कहा…

समय के भान से परे हूँ मैं
शायद ----
---- शायद तुम आ जाओ
आज की मेरी कविता "वक़्त ने साथ छोडा.." के अहेसास दिलाती हुई आपकी रचना। वारी जाउं। बहोत खुब!!!

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