जा रहा था
उसका बेटा ‘समर’ में
पहनकर सेना की
वरदी
नयनों में सागर समेटे
उसकी माँ
‘यशस्वी भव’
और ‘विजयी भव’ का
वर दी

.
प्रसंग चल रहा था
सुग्रीव और
बालि का
तन्मय होकर
देख रही थी
बालिका
निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....
जा रहा था
उसका बेटा ‘समर’ में
पहनकर सेना की
वरदी
नयनों में सागर समेटे
उसकी माँ
‘यशस्वी भव’
और ‘विजयी भव’ का
वर दी

.
प्रसंग चल रहा था
सुग्रीव और
बालि का
तन्मय होकर
देख रही थी
बालिका
5 comments:
दोनों शब्दचित्रों में श्लेष का सुन्दर प्रयोग किया गया है!
गहन अर्थों को सहेजती अच्छी रचनाएं।
वाह, अद्भुत व्यंजना।
Beautiful. wardi aur war dee tatha bali ka aur balika bahut sunder shlesh alankar ka prayog. Muze marathi kawi moropant jee ki yad aa gaee.
गहरे भाव लिये सुन्दर रचना
बधाई।
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