शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

रक्ताभ कलाई

 

अभी-अभी लौटा हूँ
एक तीर्थयात्रा से।

हाँ, यह बात अलग है कि
उस यात्रा में
मैं न किसी मंदिर गया,
न मस्जिद,
न गुरुद्वारे।

शायद तुम्हें याद हो
हम दोनों का
पहला मिलन-स्थल।

मेरे लिए
वह किसी भी तीर्थ से
कम नहीं।

सहेज लाया हूँ
वहाँ से
उँगलियों के
प्रथम स्पर्श की
वह संकुचाई-सी थरथराहट।

मिल गया
वहीं पड़ा हुआ
तुम्हारी चूड़ी का
वह टूटा हुआ टुकड़ा

जिसे आज भी
मेरी उतावली उँगलियों का
अपराध याद है।

तुम्हारी कलाई पकड़ते ही
जो चूड़ी चटक गई थी,
और उसकी किरच से
तुम्हारी कलाई
हल्के-से
रक्ताभ हो उठी थी।

फिर से जिया
सोपान-दर-सोपान
स्पर्श से
अनकहे आलिंगन तक का
वह सम्पूर्ण सफ़र।

और लौट आया
अपनी स्मृतियों में
उस तीर्थ का
प्रसाद लेकर।

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