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सोमवार, 7 जून 2010

निकालेंगे यहीं से एक नहर ~~

रूठे बादलों

तुम्हारा रूठना सबक दे गया

बेशक तूँ हमारे दुख-दर्द

न हर

तय कर लिया है हमने

निकालेंगे यहीं से एक

नहर

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जैसे ही बादलों ने

धरा को

मेंह दी

उसे लगा

साजन आने वाले हैं

वह रचने लगी

मेंहदी

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बुधवार, 2 जून 2010

राख झाड़ दो ~~

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चटका लगाकर मूल आकृति में पढ़े : .......................

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शनिवार, 15 मई 2010

अब उठा ही लो कुदाली .....

चिडियो ने

वतन है छोडा

विचरण करते यहाँ

अब तो चहुँ ओर

काग जी,

थोथे हैं

पक्षी संरक्षण के आँकड़े

ये तो हैं महज

कागजी.

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खयाली घोड़े

तुमने तो बहुत

कुदा ली,

लौट आओ हकीकत में

अब उठा ही लो

कुदाली.

सोमवार, 3 अगस्त 2009

---- शायद तुम आ जाओ #



उस दिन तय था कि
हम मिलेंगे
इसी दरख्त के नीचे
परिन्दों की चहकन सुनते हुए
बैठा रहा मैं ख्वाब बुनते हुए
समय के भान से परे हो गया था
और -----
----- और तुम नहीं आई
.
आज जबकि तय है कि
तुम नहीं मिलोगी
इस दरख्त के नीचे
तनहा आँखें मीचे
परिन्दों की चहकन सुनते हुए
बैठा रहा हूँ मैं ख्वाब बुनते हुए
समय के भान से परे हूँ मैं
शायद ----
---- शायद तुम आ जाओ
.
आखिर तय का कुछ
पता तो नहीं है ----