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शुक्रवार, 17 जून 2011

अब तक संचित वह क्षण ..



तब जबकि
तुम्हारे काँपते हाथों पर
मैनें
अनायास
रख दिया था हाथ;
और फिर
क्षण भर के लिये
प्रकम्पित हो गया था
सम्पूर्ण कायनात,
परिलक्षित हुआ
चिर संचित
सम्पूर्ण चेतना का
अवचेतित स्वरूप
अवशोषित हो गया था
जब पलांश में
सूर्य रश्मि;
वह प्रखर धूप.
तुम चली गयी थी
अनबोले जब
सबकुछ कहकर
वह पावन छवि
नज़र चुराते चितवन की
मधु प्रमत्त मधुकर सा
मंजर वह मदहोश
अब तक संचित वह क्षण
कहाँ मुझे है होश !!

बुधवार, 8 दिसंबर 2010

अगला धमाका होने तक ..


आज फिर

बम धमाका हुआ है,

प्रशासन फिर

नींद से जाग गया है.

लाल बत्ती युक्त गाड़ियाँ

फिर दौड़ने लगी हैं सड़कों पर

बैरकें लगा दी गयी हैं,

सड़क पर आवाजाही

प्रतिबन्धित कर दी गई हैं.

फिर

दिनचर्या को बार-बार

उलाहने दिये जायेंगे;

खुफिया कैमरे की

नई प्लान बनेगी;

हर आम आदमी को

रखा जायेगा सन्देह के दायरे में;

पूरा शहर रौशन होगा

कैमरे के फ्लैश से;

प्रायोजित जीजिविषा की तस्वीरें

बाँटी जायेंगी.

सरकार चाक-चौबन्द है

कुछ रातें नज़रों में ही

काटी जायेंगी,

फिर इंतजार किया जायेगा

जीवन सामान्य होने तक

तब तक नींद फिर हाबी होगी

प्रशासन की आँखों में

वह फिर सो जायेगी

अगला धमाका होने तक.

शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010

कायनात का प्रकम्पन ....



आज भी
यथारूप सहेज रखा है मैने
स्मृतियों के तहखाने में
अनायास और अकस्मात अर्जित
तुम्हारे उस स्पर्श को,
जिसने न केवल मेरे वजूद को
वरन
समस्त कायनात, धरती-आसमान को
क्षणांश के लिये
प्रकम्पित कर दिया था.
लाज का जो आवरण
कर लिया था तुमने धारण;
कम्पायमान अधरों से
अस्फ़ुट स्वर में
न जाने किस शब्द का
तुमने किया था उच्चारण;
वह पल
दिल के हर एहसास से अलग
यथारूप बसा हुआ है.
उस स्पर्श से विलग
न जाने कितनी बार
सुनियोजित स्पर्श किया है तुम्हें,
न जाने कितनी बार
निहारा है मैनें
तुम्हारे लाजवंती स्वरूप को,
पर नहीं हुए प्रकम्पित
धरती-आसमान फिर
.
मुंतज़िर हूँ फिर उसी
स्पर्श एहसास का,
अनुनादित करना है मुझे
स्मृतियों का तार-तार
कायनात का प्रकम्पन, मैं फिर
महसूस करना चाहता हूँ

सोमवार, 19 जुलाई 2010

छोटे-मोटे हादसे तो होते ही रहते हैं ~~ (वनांचल एक्सप्रेस)

आज दो बजे रात 'वनांचल एक्सप्रेस' के हादसे पर उपजे सवाल और सर्वसुलभ जवाब जो उपलब्ध हो रहे हैं या होंगे. एक लाईना जवाब यही होता है कि 'जाँच के आदेश दे दिये गये हैं" पर क्या मृतक के परिवार के लोगों के दिलों की भी जाँच होगी जिसमें स्थाई रूप से दु:ख और दर्द ने घर कर लिया है?
.

लगता है रेल के बड़े अधिकारी
लाईन (हाट लाईन, रेल लाईन नहीं) पर है
चलो उनसे ही पूछते हैं कि ...
जी नमस्कार!
हम जानना चाहते हैं कि
यह हादसा क्यों और कैसे हुआ?
“देखिये इतना बड़ा नेटवर्क है
छोटे-मोटे हादसे तो होते ही रहते हैं
कैसे का जवाब मैं क्या दूँ
मेरे मातहतों ने बताया है कि
दूसरे रेलगाड़ी ने पीछे से टक्कर मारी है
असलियत का पता तो तब चलता
जब टक्कर आगे से मारी गई होती”
टक्कर के बाद राहत कार्य
समय पर क्यों नहीं शुरू किया गया?
‘आप तो बस पीछे पड़ गये हैं
अरे! टक्कर रात के दो बजे हुई है
उस समय तो सारे अधिकारी सो रहे थे
नींद खुलते ही राहत भेज दी गई है
मुझे ही देखिये
कितना सुन्दर सपना आ रहा था
मुझे भी आप लोगों ने जगा दिया”
जी हादसे में कितने लोग मरे हैं?
”केवल सत्तर लोग”
पर सत्तर लोग तो ‘केवल’ नहीं होते
“आपका गणित लगता है कमजोर है
अरे! ट्रेन में तकरीबन दो हज़ार थे
और मरे सत्तर
ये केवल नहीं तो और क्या हैं?”
कौन दोषी हैं?
”यह तो जाँच के बाद ही पता चलेगा
पर लगता यही है कि
यात्री ही दोषी थे
क्योंकि वे सबसे पिछले डिब्बे में क्यों थे;
या फिर आज यात्रा पर ही क्यों थे
घर से गर ये न निकलते तो
अच्छे भले सो रहे होते
इनके अज़ीज तो आज
इस कदर न रो रहे होते”
हलो सर एक और सवाल ...
हलो आप सुन पा रहे हैं या नही? ..
लगता है हमारा सम्पर्क टूट गया ..
देखते रहिये .....

शनिवार, 5 जून 2010

पीठ पर आक्सीजन ~~

लतर ने अपना लंच और पानी का कैप्सूल पाकेट में डाला, होमवर्क का माईक्रोचिप कलाई पर चिपकाया और स्कूल जाने के लिये तैयार हो गयी. उसने माँ से कहा कि वह स्कूल जा रही है. माँ ने उसे उसका नया नवेला 20 किलो की क्षमता वाला आक्सीजन सीलिंडर उसके पीठ पर बाँधा. वह वज़न से दुहरी हो गयी.
लतर : माँ यह बहुत भारी है.
हरीतिमा : कोई बात नहीं बेटा तुम्हें तो पता है कि ले जाना ही पड़ेगा. तुम्हें तो पता है कि तुम्हारा स्कूल Oxygen-Conditioned नहीं है. और फिर यह उतना भी भारी नहीं है जितना पहले के बच्चे बस्ते ले जाते थे.
लतर : पर माँ ... मेरी पीठ में यह सीलिंडर चुभता है.
हरीतिमा : अच्छे बच्चे जिद नहीं करते.
और लतर स्कूल चली गई.
हरीतिमा काम में लग गयी. वह टेलिविजन के उस समाचार के बारे में सोचने लगी :
"आज फिर शहर में आक्सीजन रिफिलिंग सेंटर बन्द हैं. यह आक्सीजन का उत्पादन करने वाली यूनिट के एक सीलिंडर के फट जाने के कारण हुआ है. आक्सीजन की कमी के कारण जमाखोरी बढ़ गयी है और नकली आक्सीजन की आपूर्ति के कई मामले पकड़े गये हैं. सरकार हमेशा की तरह मामले को गम्भीरता से ले रही है. आक्सीजन मंत्री श्री कार्बन डाई जी ने आश्वासन दिया है कि शीघ्र ही स्थिति काबू में आ जायेगी."

हरीतिमा ने दुश्चिंता मे अपने लिये आक्सीजन की आपूर्ति को और कम कर दिया.
image
......... पर्यावरण के प्रति न चेते तो यह स्थिति दूर नहीं है.

शनिवार, 15 मई 2010

अब उठा ही लो कुदाली .....

चिडियो ने

वतन है छोडा

विचरण करते यहाँ

अब तो चहुँ ओर

काग जी,

थोथे हैं

पक्षी संरक्षण के आँकड़े

ये तो हैं महज

कागजी.

************

खयाली घोड़े

तुमने तो बहुत

कुदा ली,

लौट आओ हकीकत में

अब उठा ही लो

कुदाली.

रविवार, 9 मई 2010

माँ अमलतास है ~~

माँ एक शब्द नहीं
एहसास है
एक अटूट रिश्ता;
एक विश्वास है
कभी देखना गौर से
बच्चे के लिये
स्वेटर बुनते हुए उसे
ऊन को जब वह
तीलियो से उलझाती है
अपने मन की अनगिनत गांठ
खोलती है; सुलझाती है
लोरियां गाती है
सारी रात नहीं सोती है
पर बच्चे की पलकों पर
सपन बोती है
कितना बेफिक्र होता है बच्चा
जब माँ आसपास है
माँ एक शब्द नहीं ---
बच्चा जब संत्रास में होता है
अधबने मकान सा
माँ ढह जाती है
बच्चे के आंसुओं संग
खुद ही बह जाती है
ममतामयी माँ तो
अमलतास है
माँ एक शब्द नहीं
एहसास है
एक अटूट रिश्ता;
एक विश्वास है

चित्र : गुगल सर्च (साभार)

गुरुवार, 13 अगस्त 2009

चलो अब इसमें संस्कार बोऊँ !!

~~~~~~~
वह असंस्कारित था
मैने उसे संस्कार देना चाहा
मैंने उसे जिन्दगी का
सार देना चाहा
मैने कहा बोलो 'प्रणाम'
वह फुसफुसाया
अपनी जुबान हिलाया
और बोला 'रोटी'
मैं समझ गया कि
वह भूखा है
मैने उसे रोटी खिलाई
ठंडा पानी पिलाया

वह शातिर था -
वह अपनी भूख को भुना रहा था

वह अब गुनगुना रहा था
मुझे लगा
अब शायद प्रयास में सफल होऊँ
चलो अब इसमें संस्कार बोऊँ

*
मैने कहा बोलो 'प्रणाम'
वह फिर फुसफुसाया
अपनी जुबान हिलाया
और बोला 'बोटी'

~~~~

शनिवार, 18 जुलाई 2009

माँ एहसास है --


माँ एक शब्द नहीं
एहसास है
एक अटूट रिश्ता;
एक विश्वास है
कभी देखना गौर से
बच्चे के लिये
स्वेटर बुनते हुए उसे
ऊन को जब वह
तीलियो से उलझाती है
अपने मन की अनगिनत गांठ
खोलती है; सुलझाती है
लोरियां गाती है
सारी रात नहीं सोती है
पर बच्चे की पलकों पर
सपन बोती है
कितना बेफिक्र होता है बच्चा
जब माँ आसपास है
माँ एक शब्द नहीं ---
बच्चा जब संत्रास में होता है
अधबने मकान सा
माँ ढह जाती है
बच्चे के आंसुओं संग
खुद ही बह जाती है
ममतामयी माँ तो
अमलतास है
माँ एक शब्द नहीं
एहसास है
एक अटूट रिश्ता;
एक विश्वास है

.

शनिवार, 11 जुलाई 2009

निरावेशन की शून्यता मंजूर नहीं --


तुम प्रोटोन
मैं इलेक्ट्रोन
तुम्हारा आकर्षण
खींचता है मुझे तुम्हारी ओर
अनवरत; निरंतर
पर मैं आर्बिट से आबध्द
तुम्हारी ओर
आ भी तो नहीं सकता
.
तुम आवेशित;
मैं आवेशित
फिर बीच में क्यों है
न्यूट्रोन निरावेशित
उफ़! मैं तुमसे दूर
जा भी तो नहीं सकता
शायद,
तुम्हारे इर्द-गिर्द घूमना
मेरी नियति है
क्योंकि तुमसे मिलते ही
हम दोनों का समस्त आवेश
शून्य हो जाएगा
.
नहीं-नहीं !!
निरावेशन की
शून्यता मुझे मंजूर नहीं है
बेशक मैं
घूमता रहूँगा तुम्हारे इर्द-गिर्द
ताउम्र बिना रुके; निरंतर ---

रविवार, 5 जुलाई 2009

तलाश जलते तवे की ----!!


जलते तवे पर
एक बूँद सा मैं जला.
पलांश में आया
भयानक जलजला
और मैं,
भाप बनकर उड़ चला
शायद दिल में हसरत थी
बादल बनने की;
तुम्हारे छत पर
चादर सा तनने की
भीगो देना चाहता था
तुम्हारा छत;
बरसना चाहता था
अनवरत
तुम जहां आकर
गुनगुनाती हो
हर बारिश के साथ
भीग जाती हो.
पर शायद
वायुदाब की कमी थी
या शायद
मेरे अन्दर ‘आब’ की कमी थी
बादल नहीं बन पाया
तरसता रह गया बरसने को

आज फिर अपने अन्दर
और अधिक आब इकट्ठा करके
किसी जलते तवे को तलाश रहा हूँ
तय है कि एकदिन मैं
बादल बनूंगा
बरसूंगा तुम्हारे छ्त पर
मैं सावन ----

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

एक कबूतर दब गया था ----


तुमने कहा --
रूको, मत जाओ
मैनें समझा --
रूको मत, जाओ
और मैं
चुपचाप चला आया था -- उस दिन
बिना किसी शोर
बिना किसी तूफान
कितना भयानक
ज़लज़ला आया था -- उस दिन
काश !
तुमने देखा होता
चट्टान का खिसकना
काश !
तुमने भी देखा होता
वह मंजर
जब एक मकान
ढहा था अधबना
और
उड़ने को आतुर एक कबूतर
दब गया था
शायद यह --
‘वैयाकरण’ की साजिश थी