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बुधवार, 23 मार्च 2011

उद्घाटन ... (लघुकथा)


अभी भवन निर्माण का कार्य सम्पन्न भी नहीं हुआ था पर मंत्रालय से सूचना आ गयी कि कल मंत्री जी भवन का उद्घाटन करने वाले हैं. सारा का सारा महकमा व्यवस्था में लगा हुआ था. भवन के पिछले हिस्से का कार्य चल ही रहा था. अफरा-तफरी के इस माहौल में तय हुआ कि भवन के पिछले हिस्से को ढक दिया जाये और मंत्री जी से भवन के मुख्य द्वार पर फीता कटवाकर उद्घाटन करवा लिया जाये. सारे के सारे मजदूर पीछे के हिस्से में ही रहें, यह जाहिर न होने पाये कि अभी कार्य चल रहा है. तभी सूचना मिली की सभी मजदूर पिछले हिस्से के एक भाग के गिरने से दब गये हैं. आपात मीटिंग बुलाई गई. तय हुआ कि क्योंकि अब समय कम है अत: राहतकार्य तुरंत न शुरू करके उद्घाटन के बाद करवाया जायेगा. सहमति के बीच एक आशंका भी उठी कि कहीं दबे हुए मजदूर उद्धाटन के दौरान ही चीख-पुकार मचाने लग गये तो क्या होगा?

अंततोगत्वा, कुछ अधिकारी घटनास्थल पर पहुँचे और दबे हुए मजदूरों से बोले “तुम्हें हर हालत में अपनी चीख दबाकर रखनी है, हम भवन के उद्घाटन के तुरंत बाद न केवल बाहर निकालेंगे वरन तय मुआवजे से ज्यादा मुआवजा भी दिलवायेंगे”. मजदूर आस के सहारे बिना चीखे पड़े रहे और उद्घाटन समारोह पूर्वक सम्पन्न हो गया. मंत्री ने भवन की आलीशानता की तारीफ की. सफल कार्यक्रम की सम्पन्नता से उत्साहित पूरा विभाग दावत में व्यस्त हो गया. सभी उन दबे मजदूरों को भूल गये. वे मजदूर मुआवजे के सपनों के बीच आज भी वहीं दबे पड़े हैं और विभाग उद्धाटन की दावत में व्यस्त है.