गुरुवार, 16 जून 2011
लाईन सीधी हो गई ...
सोमवार, 11 अप्रैल 2011
सबसे सुरक्षित स्थान ... (लघुकथा)
पूरा महकमा हलकान था। शहर में चोरों का तांडव था और हवा में एक अजीब-सी घुटन घुलती जा रही थी। सरकार ने सख्त फरमान जारी किया—“किसी भी कीमत पर आम आदमी को यह भरोसा दिलाया जाए कि उसकी सुरक्षा सर्वोपरि है,” क्योंकि लोकतंत्र में भरोसा भी एक आंकड़ा होता है—वोटों के साथ जुड़ा हुआ।
पुलिस ने आम आदमी की सुरक्षा के नाम पर शहर को सुरक्षा-जाल में लपेट दिया। जगह-जगह बैरकें, चेकपोस्ट और ‘सुरक्षित मार्ग’ बनाए गए—नतीजा यह हुआ कि रास्ते इतने सुरक्षित हो गए कि चलना ही असंभव हो गया। आम आदमी फिर भी कहीं न कहीं चपेट में आता रहा, और अपराधी नियमों की दरारों से मुस्कुराते हुए गुजरते रहे।
आपात बैठक बुलाई गई। फाइलें खुलीं, आँकड़े बोले, और समाधान तलाशा गया। लंबी बहस के बाद एक क्रांतिकारी निर्णय हुआ—अगर अपराध खत्म नहीं हो पा रहा, तो अपराध का “लक्ष्य” ही खत्म कर दिया जाए। यानी आम आदमी को ही किसी सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया जाए।
तर्क सरल था—जहाँ शिकार ही नहीं, वहाँ शिकारी भी नहीं।
योजना तुरंत लागू हुई।
और वह असाधारण रूप से सफल रही।
अब शहर में कोई अपराध नहीं होता।
क्योंकि अब शहर में कोई “आम आदमी” नहीं बचा।
बाकी सब सुरक्षित हैं—अंदर से बंद, और बाहर से “कानूनन सुरक्षित” घोषित जेलों में।
और शहर?
वह अब पूरी तरह शांत है—इतना शांत कि सवाल तक नहीं उठते।
बुधवार, 23 मार्च 2011
उद्घाटन ... (लघुकथा)
अभी भवन निर्माण का कार्य सम्पन्न भी नहीं हुआ था पर मंत्रालय से सूचना आ गयी कि कल मंत्री जी भवन का उद्घाटन करने वाले हैं. सारा का सारा महकमा व्यवस्था में लगा हुआ था. भवन के पिछले हिस्से का कार्य चल ही रहा था. अफरा-तफरी के इस माहौल में तय हुआ कि भवन के पिछले हिस्से को ढक दिया जाये और मंत्री जी से भवन के मुख्य द्वार पर फीता कटवाकर उद्घाटन करवा लिया जाये. सारे के सारे मजदूर पीछे के हिस्से में ही रहें, यह जाहिर न होने पाये कि अभी कार्य चल रहा है. तभी सूचना मिली की सभी मजदूर पिछले हिस्से के एक भाग के गिरने से दब गये हैं. आपात मीटिंग बुलाई गई. तय हुआ कि क्योंकि अब समय कम है अत: राहतकार्य तुरंत न शुरू करके उद्घाटन के बाद करवाया जायेगा. सहमति के बीच एक आशंका भी उठी कि कहीं दबे हुए मजदूर उद्धाटन के दौरान ही चीख-पुकार मचाने लग गये तो क्या होगा?
अंततोगत्वा, कुछ अधिकारी घटनास्थल पर पहुँचे और दबे हुए मजदूरों से बोले “तुम्हें हर हालत में अपनी चीख दबाकर रखनी है, हम भवन के उद्घाटन के तुरंत बाद न केवल बाहर निकालेंगे वरन तय मुआवजे से ज्यादा मुआवजा भी दिलवायेंगे”. मजदूर आस के सहारे बिना चीखे पड़े रहे और उद्घाटन समारोह पूर्वक सम्पन्न हो गया. मंत्री ने भवन की आलीशानता की तारीफ की. सफल कार्यक्रम की सम्पन्नता से उत्साहित पूरा विभाग दावत में व्यस्त हो गया. सभी उन दबे मजदूरों को भूल गये. वे मजदूर मुआवजे के सपनों के बीच आज भी वहीं दबे पड़े हैं और विभाग उद्धाटन की दावत में व्यस्त है.
शनिवार, 29 मई 2010
ये हरामज़ादे नौकर भी ऐसे ही हैं ~ ? ~ (लघुकथा)
आज तो आप छा गये, क्या लच्छेदार बोले आप !! देखा नहीं लोग तालियाँ किस कदर पीट रहे थे.
अजी ज़र्रानवाजी है आपकी.
और आपने विषय भी तो ज़बरदस्त लिया था, वो क्या था! हाँ याद आया - "बाल मजदूरी समाज के लिये कलंक"
जी हाँ!
अच्छा अब मुझे इजाजत दीजिये.
अरे नहीं! ऐसे कैसे, चाय तो पीते जाईये. अरे छोटू! कहाँ मर गया? ये हरामज़ादे नौकर भी ऐसे ही हैं? खाते समय इनकी फुर्ती देखते बनती है और काम के समय तो जैसे जान निकल जाती है.
जी मालिक!
मालिक के बच्चे! जा जल्दी से चाय बना के ला.
और 10 वर्षीय छोटू चाय बनाने चला गया.
बैठक से अभी भी विषय गाम्भीर्य, प्रस्तुतीकरण तथा समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा ज़ारी थी.

गुरुवार, 27 मई 2010
आधा तुम्हारे लिये और आधा मेरे लिये, बाकी बचे सो ... (लघुकथा)
उसने अपनी प्रजा से कहा जाओ और मेहनत करो, खेतों में रोटियाँ उगाओ. हम तुम्हें खुशहाल देखना चाहते है.
उसके कारिन्दे उन्हें शर्ते बताने लगे :
"कोई भी रोटी खाने की हिमाकत न करे. उत्पादित रोटी पहले यहा लाया जायेगा. राजा पहले उसका निरीक्षण करेंगे और फिर तुम्हें तुम्हारा हिस्सा मिल जायेगा."
लोग चले गये. मेहनत की और कुल एक सम्पूर्ण रोटी का उत्पादन किया. वे उसे लेकर कारिन्दे के पास आये. कारिन्दे ने रोटी लिया और राजा के पास ले गया. रास्ते में एक टुकड़ा रोटी कम हो गया (??). जब राजा ने नुचे हुए हिस्से के बारे में पूछा तो कारिन्दे ने बताया कि खेत में कोई दोष है, रोटी ऐसी ही उत्पादित हुई थी.
राजा ने कहा इसे दो हिस्से में बांट दो. एक हिस्सा मैं खा लेता हूँ और दूसरा तुम खा लो, बाकी जो बचेगा वह लोगों में बांट देना.
कारिन्दा हैरान था आखिर बचेगा क्या जो बांटा जायेगा. उससे रहा नहीं गया, उसने राजा से पूछ लिया. राजा को उसकी मूर्खता पर हैरानी हुई. उन्होने बताया, "जब हम खायेंगे तो जूठन नहीं बचेगा क्या" वही बाँट देना.
कारिन्दा ने वैसा ही किया. जनता अपना हिस्सा पाकर निहाल हो गयी. राजा के जयकारे लगने लगे.
