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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

डिकोड

 

पता नहीं,
तुम डिकोड कर पाई
या नहीं—

अंतिम बार
तुमसे दूर जाने से पहले
मैंने
तुम्हारी अनुमति से
तुम्हारी पीठ पर

भाषा और लिपि रहित
कुछ लिखा था।

और मैं लौटा था
सहेजकर
उस सिहरन को,

जो
मेरी उँगलियों के स्पर्श से
तुम्हारे चेहरे पर
अनायास
उभर आई थी।

याद है—

तुमने
हर बार की तरह
मुड़कर
मुझे जाते हुए
देखा भी नहीं था।

और फिर
जाते हुए भी
मैं जा कहाँ रहा था—

मैं तो
तुम्हारी पीठ पर
एक संदेश की शक्ल में
मौजूद था।

शायद
इसीलिए तुमने
पीछे मुड़कर नहीं देखा।

क्योंकि
कुछ संदेश
पीछे मुड़कर
नहीं पढ़े जाते—

वे
उम्र भर
अपने सिरहाने
रखे जाते हैं।

और फिर
हर रात
सोने से पहले
बिना पढ़े ही
पढ़ लिए जाते हैं।

शुक्रवार, 17 जून 2011

अब तक संचित वह क्षण ..



तब जबकि
तुम्हारे काँपते हाथों पर
मैनें
अनायास
रख दिया था हाथ;
और फिर
क्षण भर के लिये
प्रकम्पित हो गया था
सम्पूर्ण कायनात,
परिलक्षित हुआ
चिर संचित
सम्पूर्ण चेतना का
अवचेतित स्वरूप
अवशोषित हो गया था
जब पलांश में
सूर्य रश्मि;
वह प्रखर धूप.
तुम चली गयी थी
अनबोले जब
सबकुछ कहकर
वह पावन छवि
नज़र चुराते चितवन की
मधु प्रमत्त मधुकर सा
मंजर वह मदहोश
अब तक संचित वह क्षण
कहाँ मुझे है होश !!