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शुक्रवार, 17 जून 2011

अब तक संचित वह क्षण ..



तब जबकि
तुम्हारे काँपते हाथों पर
मैनें
अनायास
रख दिया था हाथ;
और फिर
क्षण भर के लिये
प्रकम्पित हो गया था
सम्पूर्ण कायनात,
परिलक्षित हुआ
चिर संचित
सम्पूर्ण चेतना का
अवचेतित स्वरूप
अवशोषित हो गया था
जब पलांश में
सूर्य रश्मि;
वह प्रखर धूप.
तुम चली गयी थी
अनबोले जब
सबकुछ कहकर
वह पावन छवि
नज़र चुराते चितवन की
मधु प्रमत्त मधुकर सा
मंजर वह मदहोश
अब तक संचित वह क्षण
कहाँ मुझे है होश !!