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रविवार, 29 अप्रैल 2012

कथोपकथन हो गया …..


नजर मिली
नजर झुकी
कथोपकथन हो गया
मन बावरा
न जाने किन ख्वाबों में
खो गया
.
‘पत्थर’ ने
पत्थर मारा
चोट लगी
‘पत्थर’ को
पत्थरमय फिर
आसमान हो गया
‘पत्थर’ भी भागे
घर को
.
जुल्म को कभी
सह मत
गलत से
न हो कभी
सहमत
.

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

अब तक तो वो आई ना

चलो मान लिया
कि तुम नहीं
दृष्टिहीन हो,
पर फायदा क्या
जब तुम्हारे अंदर
दृष्टि ही न हो
*************

बिछा रखा था
जिसके लिये
हर राह में आईना
आस टूटने लगी है
अब तक तो वो
आई ना
***************


ओ री सखी !
अब तो शुरू कर दे
सजना
आ ही रहे होंगे
तुम्हारे
सजना

शनिवार, 7 अप्रैल 2012

तीन स्थितियां तीन शब्द चित्र



धूप में
भूखा-प्यासा
जलता रहा सूरज
फिर भी
पूरे दिन
चलता रहा सूरज
.
तुम्हारी चुप्पी के
उस कथन को
सुनता रहा मैं.
सुन न पाया
तदुपरांत जो कुछ
कहती रही तुम.
.
कार्यालय के
पिछली गेट से निकल गए
पार्टी प्रवर्तक
मुख्य द्वार पर
ठगे से खड़े रह गए
सम अर्थक

शनिवार, 30 अक्टूबर 2010

‘यशस्वी भव’ ‘विजयी भव’ ~~


जा रहा था
उसका बेटा समरमें
पहनकर सेना की
वरदी
नयनों में सागर समेटे
उसकी माँ
यशस्वी भव
और विजयी भवका
वर दी
 *****
प्रसंग चल रहा था
सुग्रीव और
बालि का
तन्मय होकर
देख रही थी
बालिका

शुक्रवार, 19 जून 2009

नदी नहा कर पोछ रही बदन --- (शब्द चित्र)


मुहअंधेरे- भोर में,

नदी नहा कर

पोंछ रही थी बदन

सूरज की आँख खुल गयी

नज़ारा देख शर्म से लाल हुआ

बढ़ने लगी तपन

-------------------

हवाएं

सरसराते हुए

चुपके से

शाखों को झुला रहीं थी झूला

सूरज ने देख लिया

हो रहा है --

आगबबूला

रविवार, 7 जून 2009

कहीं बात आम न हो जाए --













सागर की
बादलों से हुई
खामोश गुफ्तगू को
एक लहर ने सुना
मन ही मन
कुछ गुना
और यह बात
शहर से कहने को चुना
वह था बेहद भावविभोर
तभी तो
करता हुआ शोर
भागा किनारे की ओर
---
सागर को हुआ संकोच
कहीं बात आम न हो जाए
वह बिना बात के
बदनाम न हो जाए
उसने, उसे
रोकने का फैसला किया
देखो -
सैकडो दूसरी लहरों को
उसे वापस लाने के लिए
उसके पीछे दौड़ा दिया

मंगलवार, 2 जून 2009

बेरौनक मिली अधजली पगली!! -- शब्द चित्र












शादी की रात से पहले
गली
खुश थी इतनी कि
संज-संवर कर
गली-गली घूमने
निकल पड़ी गली
-------------
शादी की रात के बाद
सड़ांध भरी गली
मुख्य सड़क से पनाह मांगती
बेरौनक मिली
अधजली
पगली

रविवार, 31 मई 2009

भीड़ और तन्हाई : दो शब्द चित्र


मेरी तन्हाई
इतनी घबराई
कि
मुझे छोड़कर
भीड़ में नज़र आई

--------------

चारों तरफ़
मेला था
पर
मै भीड़ में
बिल्कुल अकेला था

गुरुवार, 28 मई 2009

सूरज - दो शब्द चित्र

.
सूरज
धूप की तपिश
सह नहीं पाया
देखो-
ढूंढ़ रहा है
किसी पेड़ की छाया









सूरज
ख़ुद की गर्मी
सह नहीं पाया
साँझ ढलते ही
सागर की
आगोश में समाया

रविवार, 24 मई 2009

दो शब्द चित्र (2)


घर के खपरैलों से
आंगन की देहरी पर
धूप यूं पॉव धरती है
जैसे कोई नवेली
हौले हौले
सीढियाँ उतरती है










रास्ते क्या
नज़र नहीं आते?
सुबह के भूले
इन दिनों शाम तक
घर नहीं आते

शनिवार, 9 मई 2009

दो शब्द चित्र

हर राह के इर्द-गिर्द मैं
फूल बनकर खिला
लोग आए
मुस्कुराए
भर ली झोलियाँ
मेरे खुशबुओं से
और फिर अकारण
मुझे रौदकर चले गए


















हर रह के इर्द-गिर्द
नुकीले पत्थर बनकर
बिखर गया
लोग आए
घबराए
मेरे तंज को
नहीं सह पाए
और फिर
पीले चेहरे लिए
राह बदल कर
चले गए