
आज भी
यथारूप सहेज रखा है मैने
स्मृतियों के तहखाने में
अनायास और अकस्मात अर्जित
तुम्हारे उस स्पर्श को,
जिसने न केवल मेरे वजूद को
वरन
समस्त कायनात, धरती-आसमान को
क्षणांश के लिये
प्रकम्पित कर दिया था.
लाज का जो आवरण
कर लिया था तुमने धारण;
कम्पायमान अधरों से
अस्फ़ुट स्वर में
न जाने किस शब्द का
तुमने किया था उच्चारण;
वह पल
दिल के हर एहसास से अलग
यथारूप बसा हुआ है.
उस स्पर्श से विलग
न जाने कितनी बार
सुनियोजित स्पर्श किया है तुम्हें,
न जाने कितनी बार
निहारा है मैनें
तुम्हारे लाजवंती स्वरूप को,
पर नहीं हुए प्रकम्पित
धरती-आसमान फिर
.
मुंतज़िर हूँ फिर उसी
स्पर्श एहसास का,
अनुनादित करना है मुझे
स्मृतियों का तार-तार
कायनात का प्रकम्पन, मैं फिर
महसूस करना चाहता हूँ