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मंगलवार, 26 जून 2012

पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना …..


तेरी गली से होकर गुजरने लगा है आईना
तेरी हर आहट पर संवरने लगा है आईना
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लटें संवार कर तुम चली गयी पल भर में
जाने क्या सोचकर उछलने लगा है आईना
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जाने कब, कहाँ, किस राह से तुम गुजरो
हर राह में बेसब्र बिखरने लगा है आईना
.
उकेरता नहीं किसी और का प्रतिबिम्ब यह
रात ढलते ही देखिये कहरने लगा है आईना
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अक्सर इसका वजूद अनगिनत हो जाता है
नजरों के आईने में उतरने लगा है आईना
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डालती ही क्यूं हो इसपर सवालिया निगाह
टूट जाएगा इसकदर मचलने लगा है आईना
.
बेपनाह मुहब्बत का सबूत और क्या होगा
पत्थरों के गाँव में ठहरने लगा है आईना

शनिवार, 20 नवंबर 2010

एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?

[IMG000006.jpg] क्षितिजा जी की बेहद खूबसूरत रचना उफ़ !! के कमेंट में मैनें एक शेर लिखा जिसके प्रतिक्रिया में उनका ईमेल आया :

"वर्मा जी ... आपके कमेन्ट के लिए शुक्रिया ... आप एक बहुत खूबसूरत शेर के साथ अपना कमेन्ट छोड़ कर आयें हैं ... एक गुज़ारिश है ... उसमें चंद शेर और जोड़ कर ग़ज़ल पूरी ज़रूर कीजियेगा ... शुक्रिया"

गुज़ारिश की कद्र और शुक्रिया अदा करते हुए कोशिश किया और जो कुछ बन पड़ा आपके सामने है :



एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?



मत पूछिए ये दिल चाक-चाक क्यूँ है

एहसासों को पत्थर की पोशाक क्यूँ है?
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हालात का तर्जुमा तुम्हारी निगाहों में है

दर्द को छुपाने की फिर फिराक़ क्यूँ है?
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तुम्हारे आँकड़ों पर यकीन करें भी कैसे?

ज़हर भरा आख़िर फिर खुराक़ क्यूँ है?
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माना परिन्दे छोड़े गये हैं उड़ान भरने को

नकेल से बँधी फिर इनकी नाक क्यूँ है?
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खुद संभल जाओगे मत माँगो सहारा

रहनुमा में शुमार ओबामा बराक क्यूँ है?