गुरुवार, 2 जुलाई 2009

एक कबूतर दब गया था ----


तुमने कहा --
रूको, मत जाओ
मैनें समझा --
रूको मत, जाओ
और मैं
चुपचाप चला आया था -- उस दिन
बिना किसी शोर
बिना किसी तूफान
कितना भयानक
ज़लज़ला आया था -- उस दिन
काश !
तुमने देखा होता
चट्टान का खिसकना
काश !
तुमने भी देखा होता
वह मंजर
जब एक मकान
ढहा था अधबना
और
उड़ने को आतुर एक कबूतर
दब गया था
शायद यह --
‘वैयाकरण’ की साजिश थी

16 comments:

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत भावमय और मार्मिक अभिव्यक्ति है शुभकामनायें

USHA GAUR ने कहा…

तुमने कहा --
रूको, मत जाओ
मैनें समझा --
रूको मत, जाओ
जी हा यह तो वैयाकरण की ही साजिश है.
मार्मिक रचना ---
बहुत खूब

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

तुमने कहा --
रूको, मत जाओ
मैनें समझा --
रूको मत, जाओ
बहुत सुन्दर भावः पूर्ण रचना है अच्छी लगी

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत भावनात्‍मक .. सुंदर रचना !!

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

वैयाकरण की साजिश...! वाह, क्या बात है।

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति!

Razia ने कहा…

aapke lakhne ka kamal

Dhiraj Shah ने कहा…

सबसे पहले राम राम, टिप्पणी देने के लिये धन्यवाद
सुन्दर अभिव्यक्ति

sandhyagupta ने कहा…

Is sundar aur arthpurn rachna ke liye badhai.

cartoonist anurag ने कहा…

aaderneey
varma ji bahut hi marmik rachna hai....seedhe dil par var karti hai...

रंगनाथ सिंह ने कहा…

sundar kavita h
antim do line na hoti to kavita aur bhi prabhavsali hoti...

दिगम्बर नासवा ने कहा…

शशक्त अभिव्यक्ति .......... गहरी रचना है ....... कमाल का लिखते हैं आप ..... लाजवाब

'अदा' ने कहा…

तुमने कहा --
रूको, मत जाओ
मैनें समझा --
रूको मत, जाओ
और मैं
चुपचाप चला आया था -- उस दिन

bahut khoob..
behtareen..
sachmuch yah 'vaiyakaran' ki hi saajish hai...

Babli ने कहा…

बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ!

ज्योति सिंह ने कहा…

तुमने कहा --
रूको, मत जाओ
मैनें समझा --
रूको मत, जाओ
और मैं
चुपचाप चला आया था -- उस दिन
marmik aur sunder .

shilpa ने कहा…

thanks for visting you have a honestt blogg will keep coming

Template by:

Free Blog Templates