प्रवाह

निरावेशन की शून्यता मुझे मंजूर नहीं है ....

राख झाड़ दो ~~

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चटका लगाकर मूल आकृति में पढ़े : .......................

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25 comments:

बहुत खूब ...!!!!

 

कुडि़यों से चिकने आपके गाल लाल हैं सर और भोली आपकी मूरत है http://pulkitpalak.blogspot.com/2010/06/blog-post.html जूनियर ब्‍लोगर ऐसोसिएशन को बनने से पहले ही सेलीब्रेट करने की खुशी में नीशू तिवारी सर के दाहिने हाथ मिथिलेश दुबे सर को समर्पित कविता का आनंद लीजिए।

 

बोरसी की बुझती आग में छिपी आंच राख झाड़ते ही तीव्र हो उठेगी ...यादों की धुन्ध हटा दे तो तस्वीरें साफ़ नजर आने लगती हैं जैसे ..
आकर्षक प्रस्तुति ...!!

 

बहुत उम्दा...ब्स, तुम उसे जमीन दे दो..काश!! इतना कर देते लोग!

 

उस बीज के अंदर गगनचुंबी दरख्त है।

बहुत सुंदर वर्मा जी

आपके इस ब्लाग में दो पॉपअप विंडो खुल रही हैं
आपने कहीं से कोई विजेट लगाया है जो विज्ञापन दे रहा है। देखिए, यह समस्या मेरे ब्लाग पर भी हो गयी थी।

 

सुंदर भावनाओं का प्रवाह...खूबसूरत क्षणिकाएँ.....धन्यवाद वर्मा जी

 

बहुत सुन्दर क्षणिकाएँ

 

खूबसूरत क्षणिकाएँ.....धन्यवाद वर्मा जी

 

bahut sundar


badhai aao ko is ke liye

 

तीनों खानिकाएं बहुत बढ़िया हैं....बीज के अंदर गगनचुम्बी दरख्त..बस ज़मीन चाहिए...बहुत प्रभावशाली...

 

काश ! मैं भी कवि होता और मुझे भी भावनाओं को कागज पर उतारना आता..! सच कहूँ तो मुझे जलन होती है..मैं कार्टूनिस्ट क्यों बना..कवि क्यों नहीं बना..? आपकी इस रचना को मैंने कॉपी-पेस्ट कर लिया है, अपने ब्लॉग पर गुलदस्ते की तरह सजाऊंगा !

 

waah sir lajawaab kavita hai...

 

बहुत सुंदर क्षणिकाएँ.....

 

बहुत सुन्दर भाव भरे है.

 

teeno para ....ek ishara bhar hain ...warna inka kathya is likhe se jyada hai .... bahut pasand aayi aap ki rachana ...:)

 

बहुत ही मनभावन और सुन्दर रचना!

 

उस बीज के अंदर गगनचुंबी दरख्त है। ...बहुत खूब ...!!!!बहुत सुंदर वर्मा जी

 

बस उसे जमीन दे दो।
क्या बात है वर्मा साहब। दिमाग की बत्ती जल गई।
जमीन ही देने का काम तो आदमी नहीं कर पा रहा है। आदमी न अपनी जमीन देता है और न अपनी जमीन पहचानता है।

 

बहुत ही सुन्दर!

 

घुमावदार कविता हैं पर भाव स्पष्ट हैं..

 

अच्छा लगा यह आशावाद.