शुक्रवार, 18 जून 2010

मुद्दतों से न आँख लगी ~ ~

आँसू न हो

किसी किसान की आँख में

अबकी बरस,

बादल हर खेत में जाकर

झूमकर तूँ

अब तो बरस.

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.

जब से तुमसे

आँख लगी,

अर्सा हो गया सोये हुए

रात आँखों में कटी

मुद्दतों से न

आँख लगी.

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10 comments:

वन्दना ने कहा…

sundar prastuti.,,,,,,gahre bhav.

Razia ने कहा…

बहुत सुन्दर शब्दों की बाजीगरी और सुन्दर भाव

उम्मेद ने कहा…

बारिश का इन्तजार करती आँखें...और मुद्दतों से किसी का इन्तजार करती आँखों मे कितना साम्य है.....दो अलग भावनाओं में पिरोई कविताएं...एक स्थान पर पहुँचती है....बधाई वर्मा जी...

AMAN ने कहा…

बहुत सुन्दर क्षणिकाएँ

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बरस और आँख लगी....दोनों शब्दों में गज़ब का चमत्कार किया है...सुन्दर प्रस्तुति

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

मंगलवार 22- 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है


http://charchamanch.blogspot.com/

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाजवाब रचना...
नीरज

arun c roy ने कहा…

विरोधाभ्हासी अर्थो से बनी सुंदर क्षणिका !

Maria Mcclain ने कहा…

interesting blog, i will visit ur blog very often, hope u go for this site to increase visitor.Happy Blogging!!!

अल्पना वर्मा ने कहा…

पहली कविता में की गयी प्रार्थना स्वीकार हो..ईश्वर करे किसी किसान की आँख में अब के बरस न आंसू हों...दूसरी रचना प्रेम के अधीन मन की स्थित बता रही है.

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