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शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम


निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

अस्फुट-स्वर-बोध करा दो ना चुप रहो आज तुम

साक्षात मगर हो

दिवा-सपन सी

साहचर्य तुम्हारा

पूस-कपन सी

लजायमान स्पर्श-कामना को स्पर्श-बोध चाहिये

कल-कल-निनाद साधों को ना अवरोध चाहिये

बाधित आतुरता के कोमल भाव सहो आज तुम

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम

भ्रमर गुंजन सी

श्वासों की लहरी

सम्पूर्ण कायनात

शायद है ठहरी

अनकहे सन्देशों ने जब सब कुछ कह डाला है

फिर क्यूँ इन मृद अधरों पर चुप्पी का ताला है

सागर-मिलन को आतुर लहरों सी बहो आज तुम

निज प्रकम्पित अधरों से कुछ कहो आज तुम